जयशंकर प्रसाद के जीवन पर केंद्रित उपन्यास ‘कंथा’ का साहित्यिक-जगत में व्यापक स्वागत हुआ है। लेखक श्यामबिहारी श्यामल से उपन्यास की रचना-प्रकिया, प्रसाद जी के जीवन और साहित्य के विविध पहलुओं पर संगीता पॉल ने बातचीत की। प्रस्तुत है संपादित अंश—

प्रेमचंद पुराने पड़ जाएँगे, जयशंकर प्रसाद नहीं

(श्यामबिहारी श्यामल जी के साथ संगीता पॉल की बातचीत)

संगीता पॉल: नमस्ते श्यामल जी! सबसे पहले तो जयशंकर प्रसाद के जीवन पर केंद्रित बेहद प्रभावशाली उपन्यास ‘कंथा’ के लिए आपको बधाई देना चाहूँगी। महाकवि से प्रेम करने वाले हम सभी पाठक और शोधार्थी इस उपन्यास के लिए आपके आभारी हैं। कृपया इस उपन्यास की रचना-प्रक्रिया के बारे में बताएँ।

श्यामबिहारी श्यामल: 2001 में जब मैं बनारस गया था, प्रसाद जी को लेकर मेरे मन में बहुत जिज्ञासा थी। मेरा मानना रहा है कि पिछली शताब्दी में हिन्दी का जो महत्त्वपूर्ण लेखन है, उसका बड़ा हिस्सा जयशंकर प्रसाद का है। इसे हम विश्वविद्यालयों में उनकी उपस्थिति से देख सकते हैं। उनके साहित्य पर काफ़ी आलोचनात्मक काम हुआ है। लेकिन दूसरी ओर मुझे दिखायी पड़ता था कि साहित्य जगत में प्रसाद जी के व्यक्तित्व के बारे में बहुत कम जानकारी है। मैं उनके बारे में जानना चाहता था। लेकिन मुझे कुछ संस्मरणों के अलावा और उनके बारे में कोई विस्तृत आधिकारिक जानकारी नहीं मिल पाती थी। मेरे मन में सवाल उठता था कि जिनका साहित्य इतना महत्त्वपूर्ण है, उनके बारे में विवरण, उनके जीवन की उपस्थिति हमारे साहित्य में इतनी कम क्यों है? बनारस में प्रेमचंद की जयंती और पुण्यतिथि के अवसर पर शहर में मेले की स्थिति होती है। प्रेमचंद और प्रसाद के रहने का जो स्थान है, वह बनारस में एकदम आसपास, क़रीब पाँच सौ मीटर दूरी पर है। लेकिन प्रसाद जी की जयंती और पुण्यतिथि आहिस्ते से गुज़र जाती है और उनकी चर्चा तक नहीं होती। यह अभी तक का वातावरण है।

लोग बनारस आते हैं, तो घाट घूमने चले जाते हैं। पूजा-पाठ करते हैं। लेकिन मैं जब बनारस गया था, तो पहुँचते ही जयशंकर प्रसाद का आवासीय परिसर खोजने चला गया। मैंने वहाँ पहुँचकर जानकारी इकट्ठी करनी शुरू की। मुझे उनके पौत्र किरणशंकर मिले, उन्होंने मुझे सामान्य शोधार्थी समझ लिया था और कुछ माँग भी की थी। बाद में जब उनको पता चला कि मैं एक पत्रकार हूँ और सिर्फ़ जिज्ञासावश आया हूँ, तब उनका भाव बदल गया। उसी दिन मैंने कुछ लोगों की सूची बनायी, जो प्रसाद जी के समय के थे; जिन्होंने प्रसाद जी को देखा था। उस पर मैंने धीरे-धीरे काम करना शुरू किया। काम करते-करते विचार आया कि मुझे प्रसाद जी के जीवन पर उपन्यास लिखना चाहिए और मैंने लिखना शुरू किया।

संगीता पॉल: जयशंकर प्रसाद की जीवन कथा को आपने पूरे विस्तार से ‘कंथा’ में लिखा है। ‘कंथा’ का अर्थ क्या है?

श्यामबिहारी श्यामल: प्रसाद जी ने प्रेमचंद के कहने पर अपने जीवन के बारे में कविता लिखी है। प्रेमचंद ‘हंस’ का आत्मकथा का अंक निकाल रहे थे। उन्होंने अनेक लेखकों से उनकी आत्मकथाएँ माँगी थीं। प्रसाद जी से आत्मकथा माँगने पर उन्होंने मना कर दिया कि मैं अपने बारे में क्या लिखूँ? लेकिन प्रेमचंद उनसे उम्र में बड़े थे। अग्रज होने के कारण प्रसाद उनका बहुत सम्मान करते थे। प्रेमचंद ने बहुत दबाव डाला, तो प्रसाद जी ने एक कविता लिखकर दी, जो इस प्रकार है—

मधुप गुनगुनाकर कह जाता कौन कहानी अपनी”

इसी कविता में और चार पंक्तियाँ आती हैं—

“उसकी स्मृति पाथेय बनी है थके पथिक की पंथा की।
सीवन को उधेड़कर देखोगे क्यों मेरी कंथा की?
छोटे-से जीवन की कैसे बड़ी कथाएँ आज कहूँ?
क्या यह ठीक नहीं कि औरों की सुनता मैं मौन रहूँ?”

‘कंथा’ कथरी यानी गुदड़ी को बोलते हैं, जो गाँव के घरों में छोटे-छोटे कपड़ों को मिलाकर बनायी जाती है। ख़ास करके बच्चों को पालते वक़्त उसकी भूमिका होती है। उसको अनेक नामों से जाना जाता है। बिहार में इसे निगड़ा और गुदड़ा कहते हैं। हिन्दी में गुदड़ी कहते हैं और संस्कृत में इसको कंथा बोलते हैं। यही ‘कंथा’ है। जयशंकर प्रसाद ने उसको अपनी कहानी के अर्थ में अपनी कविता में वर्णित किया था। इसलिए मुझे लगा कि प्रसाद जी के जीवन पर जो उपन्यास लिख रहा हूँ, उसके लिए यही शीर्षक उचित रहेगा। उनके द्वारा इस्तेमाल किये गये ‘कंथा’ शब्द के नाम से यह उपन्यास सीधे-सीधे पाठकों से और उनके जीवन से जुड़ जाएगा। इसीलिए मैंने ‘कंथा’ नाम रखा।

संगीता पॉल: आप जब बनारस गये थे, तब जयशंकर प्रसाद जी के भवन को सामने से देखने का आपका अनुभव कैसा रहा?

श्यामबिहारी श्यामल: जितनी निराशा, जितनी चिन्ता मुझे होती थी कि साहित्य में प्रसाद के बारे में विवरण की उपस्थिति नहीं है; उनके मकान को सामने से देखकर उसी अनुपात में मुझे ख़ुशी की अनुभूति हुई और मेरे मन का मृदंग जैसे बजने लगा। वह भवन बहुत बड़ा है। उस भवन को प्रसाद जी के निधन के बाद उनके पुत्र ने छोटे-छोटे कैम्पस मिलाकर बड़ा किया। पर भवन उसी समय का है। सामने जो ज़मीन है, उसके कई प्लॉट अलग-अलग थे। बाद में उनके पुत्र रत्नशंकर ने सब प्लॉट्स को एक साथ जोड़ा था। परिवार में कुछ सम्पत्ति को लेकर क़ानूनी विवाद हुआ था। इसीलिए ज़मीन ख़ाली पड़ी हुई है, मकान जस का तस पड़ा हुआ है।

संगीता पॉल: ‘कंथा’ में प्रसाद जी के युग का जो चित्र सामने आया, उसमें अनेक विभूतियों का ज़िक्र आता है। उनके युग और उनके समय के उन लोगों के बारे में बताएँ, जो आपको अधिक प्रभावित करते हैं।

श्यामबिहारी श्यामल: मुझे जिन विभूतियों ने ज़्यादा प्रभावित किया, उन विभूतियों को मैंने कंथा में शामिल किया है। अगर सबको लिया जाता, तो उपन्यास और भी बड़ा हो जाता। प्रसाद जी का जो जीवन था, उसे समेटने के लिए बहुत विस्तार की ज़रूरत थी। प्रसाद जी ने जीवन को बहुत ही अलग तरीक़े से जिया है। उनके रिश्ते जिससे भी रहे हैं, बहुत गहराई से रहे हैं। साहित्यकारों का जो आपसी मेल-मिलाप होता है, जो जीवन होता है, वह विचारों से भरा होता है। विचार विघ्न से भरा होता है। आपसी द्वंद्व-प्रतिद्वंद्व से भरा होता है। मैंने उसमें से कुछ प्रसंगों का ज़िक्र किया है। जयशंकर प्रसाद की आमतौर पर जो छवि है, गुरु, गम्भीर, विद्वान, आचार्य की; लेकिन इस उपन्यास में प्रसाद जी के जीवन पर सभी तरह के रस, रंग आये हैं।

उपन्यास में एक अंश है ‘प्रभु जी आवत हैं’। जब मैं उपन्यास लिख रहा था, उसी समय इस अंश को आपके शोध-निर्देशक प्रमोद रंजन जी ने अपनी पत्रिका जनविकल्प की साहित्य वार्षिकी (2008) में ‘शब्द-सत्ता’ शीर्षक से प्रकाशित किया था।

इस अंश में एक रोचक प्रसंग है कि एक बार महावीर प्रसाद द्विवेदी आये थे। गंगा किनारे रामघाट है और रामघाट में उनके मित्र रायकृष्णदास जी का आवास था। वहीं वह ठहरे हुए थे। प्रसाद जी सामान्य रूप से टहलते हुए सुबह उनके घर चले गये। घर जाकर देखा कि कोई बुज़ुर्ग चौकी पर अन्दर बैठा है। बुज़ुर्ग ने देख लिया और आवाज़ दी— ‘कौन है? कौन है?’ और प्रसाद जी उल्टे पाँव लौटने लगे, तब तक रायकृष्णदास निकलकर आये और बोले— ‘क्यों भाग रहे हो? कल से तुम्हारी ही चर्चा हो रही थी।’
रायकृष्णदास ने कहा— ‘महावीर प्रसाद द्विवेदी आये हुए हैं। कल से दिवेदी जी बोल रहे थे, मुझे प्रसाद जी से मिलना है।’ अन्दर से बुज़ुर्ग बोल रहे थे कि कौन है? लेकर आओ। रायकृष्णदास ने कहा— ‘प्रसाद जी आये हैं और वह भाग रहे हैं।’ तब बुज़ुर्ग ने कहा— ‘अन्दर आओ।’ तब प्रसाद जी अन्दर जाकर बैठ गये। महावीर प्रसाद द्विवेदी उनसे बहुत प्रभावित हुए थे, उस समय प्रसाद जी के कामायनी के अंश पत्रिकाओं में छप रहे थे। इन्हीं अंशों को उन्होंने पढ़ा होगा और चर्चाक्रम में उन्हाेंने कहा कि कामायनी के बहुत अंश मैंने पढ़े और बहुत ही प्रभावित हुआ हूँ। लेकिन मैंने सुना है आप वैश्य कुल से हैं। अगर आप ब्राह्मण होते, तो मैं आपके पाँव छू लेता। प्रसाद जी यह बात सुनकर एक वाक्य में उत्तर दिया— ‘चलिए ईश्वर ने मुझे एक पाप से बचा लिया।’

जयशंकर प्रसाद बहुत सूक्ष्म रूप से विचार करते थे। इस समाज का जो व्यवहार है और इसका जो अपना एक ढाँचा है, उससे उनकी सहमति या असहमति अंदाज़ हर बार अलग हुआ करता था। वह सामान्य व्यक्ति की तरह प्रतिक्रिया नहीं करते थे।

संगीता पॉल: कहा जाता है कि जयशंकर प्रसाद के साहित्य में आध्यात्मिकता और भौतिकता का समन्वय है। उनकी आध्यात्मिकता किस प्रकार की थी? क्या आपकी नज़र में उसका कोई रिश्ता मौजूदा हिन्दुत्व से बनता है?

श्यामबिहारी श्यामल: ऐसा बिल्कुल नहीं है। प्रसाद जी का जो राष्ट्र-प्रेम है, जो राष्ट्रवाद है, उनका जो हिन्दुत्व है, वह इन दिनों प्रचलित जो धाराएँ हैं, उससे अपने मौलिक रूप में ही बिल्कुल भिन्न है।

उनके जीवन पर जो मैंने काम किया है, उससे मुझे यही पता चला कि वह बहुत ज़्यादा पंडित-पुजारी की तरह आध्यात्मिक व्यक्ति नहीं थे। ईश्वर की सत्ता में वह विश्वास करते थे: लेकिन द्वंद्व में भी रहते थे। उनकी रचनाओं में भी कई जगह यह द्वंद्व आया है। कंकाल उपन्यास में तो उन्होंने धर्म के नाम पर पाखंड और हिन्दुत्व के जो मठाधीश हैं, उन पर बहुत आक्रमण किए हैं। और आज जो हिन्दुत्व चल रहा है, जो विचारधाराएँ चल रही हैं, वह तो राजनीति के कारण हैं। ये तो बिल्कुल भिन्न प्रकार की हैं। ये तो वोट प्राप्त करने के लिए हैं। प्रसाद जी का जो देश प्रेम है, वह एक देशवासी का, एक धरती के पुत्र का अपनी मिट्टी के प्रति प्रेम के रूप में है। वह किसी क़ौम के साथ ईर्ष्या, द्वेष, घृणा नहीं रखते अर्थात् उनके अन्दर ये सब बुराइयाँ नहीं हैं। उनका प्रेम सच्चा है। उनका ‘यह मधुमय देश हमारा’ एक प्रेम गीत है। मातृभूमि का जो प्रेम होता है धरती पुत्र में, वैसा है।

संगीता पॉल: जयशंकर प्रसाद के साहित्य पर आप किन दार्शनिक परम्पराओं का प्रभाव देखते हैं?

श्यामबिहारी श्यामल: प्रसाद जी का जो साहित्य है, वो बहुत ही विशाल साहित्य है। 20वीं शताब्दी में हिन्दी में जो कुछ भी लिखा गया है, उसका जितना भी गुरु गम्भीर औरवर्ल्ड क्लास क्लासिक लेखन है, वह जयशंकर प्रसाद के पास ही ज़्यादा है। मैं अपने आपको उनके साहित्य का कोई आधिकारिक अध्येता नहीं मानता। लेकन उनके साहित्य में कोई तत्कालीन सवाल नहीं है। कोई तत्कालीन समाज नहीं है। ऐसे प्रश्न नहीं हैं, जिनमें उलझकर वे रह गये हैं। उन्होंने बहुत सूझबूझ और विचारशील होकर लिखा है।

एक उपन्यास लिखने के लिए जो आवश्यकता थी, उस लिहाज़ से मैंने अपने हिसाब से उनके व्यक्तित्व के जो अर्थ हो सकते हैं, उनको प्राप्त करने के लिए उनके साहित्य को खँगाला है। अब आप लोगों में जो अध्येता हैं, जो विश्लेषक हैं, आचार्य हैं, विद्वान हैं, वे प्रसाद जी के उपलब्ध व्यक्तित्व के आधार पर नयी तरह से इस विषय की व्याख्या करें, उसकी विवेचना करें। मेरे ख़याल से यही ज़्यादा उत्तम होगा।

मैं सिर्फ़ यह कह सकता हूँ कि मैंने जो काम किया है, उसको अधिकतम ईमानदारी और तथ्यपरकता के साथ किया है। मैं अख़बार में काम करता हूँ। हर घटना में नयी कहानी जैसे हम लोग खोजते हैं; मूल जगहों पर जाकर, लोगों से मिलकर, उसी तरह से मैंने किया है। हर घटना से जुड़े भूगोल को मैंने जाना है और उससे जुड़े जो भी लोग उपलब्ध हो सकते थे, उनसे मैंने बात की है और तथ्यों को सामने लाने की कोशिश की है। जैसे प्रसाद जी के ‘प्रेम प्रसंग’ का संदर्भ लें। प्रसाद जी के बारे में यह प्रचलित रहा है कि उनकी प्रेमिका श्यामा का निधन हो गया, तो दुःख में डूबकर करुणा कलित हृदय से उन्होंने ‘आँसू’ लिखी। लेकिन मैंने जब अनुसंधान किया, तो पता चला कि ऐसा नहीं था। उनकी प्रेमिका प्रसाद जी की मृत्यु के चार दशक बाद तक जीवित थीं और उनके उपलब्ध होने का मैंने प्रमाण खोजना शुरू कर दिया। उनके नाम से मुझे डॉक्यूमेंट मिले। प्रसाद जी की प्रेमिका ज़्यादा पढ़ी-लिखी नहीं थीं लेकिन आँसू के छन्द पढ़ती थीं। कामायनी के छन्द पढ़ती थीं और रोती थीं। वह बिल्कुल सही पात्र थीं। उनमें नक़लीपन नहीं था। इस तरह से बहुत तथ्यात्मक गड़बड़ियाँ प्रचलित थीं, जिनको मैंने अपने हिसाब से सुधारा है। हालाँकि मैं उपन्यास लिख रहा था, इतना ज़्यादा मुझे तथ्यात्मक होने की कोई विवशता नहीं थी। लेकिन इसके बावजूद मैंने सोचा कि जितना मैं तथ्यों का सुधार कर सकता हूँ, उतना सत्यापित कर ही दूँ।

एक और उदाहरण है—हम लोग आमतौर पर मान लेते हैं कि किसी भी व्यक्ति के बारे में उसका जो समकालीन बोल रहा है, वह ज़्यादा प्रामाणिक है। प्रसाद जी का जब निधन हुआ, तो मैथिलीशरण गुप्त जी ने एक संस्मरण लिखा। मैथिलीशरण जी उनके समकालीन थे और उसमें उन्होंने डॉक्टर का नाम ग़लत लिखा है। न केवल ग़लत लिखा, बल्कि जिसका नाम लिखा, उस समय वह आदमी सोलह या सत्रह साल का रहा होगा। वह आदमी मुख्य डॉक्टर का सहायक था। लेकिन मैथिलीशरण जी ने उसे डॉक्टर बता दिया। उस आदमी से मेरी मुलाक़ात हुई है। उनका नाम राजेन नारायण शर्मा था। उस समय वह बिल्कुल छोटे थे, डॉक्टर नहीं थे। प्रसाद जी का इलाज डाॅक्टर उपदास सिंह ने किया था, डाॅक्टर एच. सिंह ने किया था, जो सुभद्रा कुमारी चौहान के बहनोई थे और कमला कुमारी चौहान के पति थे। वह प्रसाद जी के व्यक्तिगत मित्र भी थे और सिंगर कम्पनी में सिंगापुर में काम करते थे। वह वैद्य थे। प्रसाद जी ने उनको बनारस बुलाया। प्रसाद जी ने उनके बनारस रहने की व्यवस्था की थी। अंतिम समय में प्रसाद जी का इलाज उन्होंने ही किया था। प्रसाद जी की मृत्यु के समय वह सामने थे। उनके बारे में एक प्रसिद्ध प्रसंग है—जब मृत्यु के समय प्रसाद जी से पूछा गया कि प्रसाद जी! आपको कुछ कहना है? आपके पास समय बहुत कम है। तब यह पूछने वाले एच. सिंह ही थे। इसका उत्तर प्रसाद जी ने दिया था कि डाॅक्टर मैं जीवन-भर कहता रह गया, क्या अब भी कुछ कहने को बचा है? मैथिलीशरण गुप्त जैसे समकालीन व्यक्ति जब डॉक्टर का नाम ग़लत बता रहे हैं, तब हिन्दी की बेइज़्ज़ती हो सकती है। हमारे यहाँ लोग प्रामाणिक होकर बात नहीं करते, भावनाओं में डूब जाते हैं।

संगीता पॉल: प्रसाद जी को छायावाद का ब्रह्मा कहा जाता है| छायावादी कवि के रूप में जयशंकर प्रसाद के योगदान को आप कैसे देखते हैं? आपकी नज़र में जयशंकर प्रसाद कवि अधिक बड़े हैं या कहानीकार या नाटककार? एक पाठक के रूप में आपको उनका कौन-सा रूप सबसे प्रिय लगता है?

श्यामबिहारी श्यामल: जयशंकर प्रसाद छायावाद के प्रवर्तक तो हैं ही, साथ ही उन्हें छायावाद का ब्रह्मा कहा जाता है। सबसे बड़ी बात यह है कि प्रसाद जी ने जो भी लिखा है, वह डूबकर लिखा है। उनकी जो कविताएँ हैं, वो बिल्कुल भिन्न प्रकार की हैं। उनका जो कवि रूप है, वही ज़्यादा मुझे प्रभावशाली और मुख्य रूप लगता है। उनकी कहानियाँ, उपन्यास बिल्कुल भिन्न प्रकार के हैं। लेखों में भी वह बिल्कुल अलग भौतिक रूप में लिखे हैं। लेकिन उनका जो कवि रूप है, वह ज़्यादा प्रखर है; ज़्यादा विराट है। कहानियाँ भी बिल्कुल अलग हैं। उपन्यास तो बिल्कुल सरल हैं। ऐसा नहीं लगता कि वह हृदय गम्भीर जयशंकर प्रसाद के उपन्यास हैं। उन उपन्यासों में जो समाज का संघर्ष है, समाज का जो चित्र है, उसको देखकर बिल्कुल यह विश्वास होता है कि प्रेमचंद के समय के उनके किसी मित्र ने ये उपन्यास लिखे हैं।

संगीता पॉल: जयशंकर प्रसाद की स्त्री-दृष्टि को आप कैसे देखते हैं?

श्यामबिहारी श्यामल: प्रसाद जी का जो स्त्री दृष्टिकोण है, उसे एक सामंतवादी दृष्टिकोण कह सकते हैं। उस समय का जो समाज था, जो परिप्रेक्ष्य था, उस समय जैसा सोचा जाता था, उन्होंने सोचा। इसके बावजूद उन्होंने स्त्री को बहुत सम्मान दिया है—

“नारी! तुम केवल श्रद्धा हो
विश्वास-रजत-नग पगतल में
पीयूष-स्रोत-सी बहा करो
जीवन के सुन्दर समतल में।”

कामायनी का जो पूरा चिन्तन है, उसका एक दूसरा पहलू स्त्री का विराट स्वरूप भी है। दुनिया के जितने भी दर्शन होते हैं, सभी उसमें अपने-अपने हिसाब से व्यक्त हुए हैं। कामायनी में जो मनुष्य की भावनाएँ होती हैं, उन भावनाओं को उन्होंने काल के तीनों खण्डों में बाँटकर भविष्य और भूत को थोड़ा-थोड़ा हिस्सा दिया है, पर ज़्यादा हिस्सा वर्तमान को दिया है। एक प्रकार से उन्होंने अपने समय को व्याख्यायित करने की कोशिश की है। मनुष्य की व्याख्या की है। मनुष्य के मन की व्याख्या की है। मनुष्य सभ्यता का कैसे विकास और कल्याण हो सकता है? एक मानवतावादी चिन्तन उनका है, और स्त्री दृष्टिकोण उनका अपने समय के हिसाब से अपने समय में आगे है; ऐसा मेरा मानना है।

संगीता पॉल: प्रसाद ने भारत के कथित गौरवपूर्ण अतीत को अपने साहित्य में उभारा है। लेकिन इस भारतीय अतीत में सामंती प्रवृत्तियाँ, जातिवाद, अस्पृश्यता आदि भी घनघोर रूप से थीं, जो गौरवगान क्रम में दब जाती हैं। आप उनके इस अतीत के गौरव गान को कैसे देखते हैं?

श्यामबिहारी श्यामल: प्रसाद जी का जो दृष्टिकोण है, प्रसाद जी जिस समय में आये थे, जिस वर्ग से आये थे; वो सबके सामने है और उसी सन्दर्भ में व्याख्या या बात की जा सकती है। इसके बावजूद प्रसाद जी ने जो भी अतीत का गान किया है, उसको आज के परिप्रेक्ष्य में हम देखेंगे, तो समझ नहीं पाएँगे। उसका सही रूप सामने नहीं आ पाएगा। जैसा कि मैंने पहले कहा, प्रसाद जी का जो हिन्दुत्व है, उनका जो राष्ट्रवाद है, जो राष्ट्र-प्रेम है, वह बिल्कुल भिन्न है, मौलिक है। किसान जैसे अपने खेत से प्रेम करते हैं। अपनी फ़सल से प्रेम करते हैं। हल से प्रेम करते हैं। बीज से प्रेम करते हैं; उसी तरह प्रसाद जी अपने देश से प्रेम करते थे। उन्होंने पुराने इतिहास का अध्ययन किया और चित्रण भी किया अपने हिसाब से, उसी हिसाब से वह अपने देश के अतीत का गान करते हैं और भविष्य का निरूपण भी करते हैं।

संगीता पॉल: जयशंकर प्रसाद और प्रेमचंद समकालीन थे, इन दोनों के साहित्य के सम्बन्ध में आपकी राय क्या है?

श्यामबिहारी श्यामल: जयशंकर प्रसाद राजनीतिक रूप से वाम विचारधाराओं से बिल्कुल नहीं जुड़े थे। प्रसाद जीवन की व्याख्या करते हैं, जीवन का चित्रण नहीं करते हैं। जीवन का निरूपण करते हैं, जीवन का प्रक्षेपण नहीं करते हैं। इसका बारीक अन्तर हमें समझना होगा। प्रेमचंद और प्रसाद के साहित्य में बहुत अंतर है। गोदान का विकल्प है। लेकिन कामायनी का विकल्प कहाँ है? आप देखेंगी कि प्रेमचंद का ज़्यादातर साहित्य अब प्रासंगिक नहीं रहा है। प्रेमचंद के गाँवों में हम जाएँगे, तो गाँव का जो चित्रण हुआ है, वह बनारस के आसपास के गाँवों का चित्रण है। प्रेमचंद ने स्कूल का चित्रण किया है, जो हमारे सामने है। वहाँ प्रेमचंद ने पढ़ाया भी है और पढ़े भी हैं। जहाँ भारतेंदु भी पढ़े हैं। वह स्कूल बदल गया है। उनके जो ऑब्जेक्ट और सब्जेक्ट हैं, सब बदल गये हैं। लेकिन जयशंकर प्रसाद ने जिन प्रसंगों को चुना है, जिन वस्तु और ऑब्जेक्ट और सब्जेक्ट को चुना है, वो तो अस्थावर नहीं हैं। वो चंद्रगुप्त पर लिखते हैं। स्कंदगुप्त पर लिखते हैं। मनु पर लिखते हैं। प्रसाद जी ने लिखने के लिए राम, कृष्ण को नहीं चुना। बुद्ध को नहीं चुना। मनु को क्यों चुना? क्योंकि उनका दृष्टिकोण कुछ भिन्न था। वो सामान्य रूप से कोई आध्यात्मिक व्यक्ति नहीं थे। राम, सीता को चुनते, हनुमान को चुनते, तो भक्ति में डूब जाते। वह तो मनुष्य के जीवन पर व्याख्या करते थे। उसको एक नये ढंग से जीवन-दर्शन का प्रतिपादन करना था। इसीलिए उन्होंने मनु और सतरूपा को चुना। कामायनी जैसे महाकाव्य को चुना।

संगीता पॉल: अब अंत में मैं आपसे आपके आगामी लेखन की योजना के बारे में जानना चाहूँगी। मैंने कहीं पढ़ा है कि भारतेंदु हरिश्चंद्र के जीवन पर उपन्यास लिखना भी आपकी योजना में शामिल है। इन दिनों आप क्या लिख रहे हैं?

श्यामबिहारी श्यामल: जयशंकर प्रसाद के जीवन पर मैंने लिखा, क्योंकि उनके जीवन के ऊपर हिन्दी में कुछ ज़्यादा उपलब्ध नहीं था लेकिन भारतेंदु पर बहुत ज़्यादा लिखा गया, जिसको छानने की ज़रूरत है। साफ़ करने की ज़रूरत है और मैं जो लिख रहा हूँ, वह भारतेंदु हरिश्चंद्र के जीवन के ऊपर बिल्कुल नये ढंग से है। भारतेंदु के जीवन में कुछ कुण्ठाएँ थीं। ऐसी कुण्ठाएँ थीं, जिनसे भारतेंदु दिन-रात परेशान और पीड़ित रहते थे। उन्हीं कुण्ठाओं को लेकर मैं उनके जीवन पर नये शीर्षक में लिखने का प्रयास कर रहा हूँ। भारतेंदु जगह-जगह बोले भी हैं। जैसे उनका एक वाक्य मशहूर है— ‘इस धन ने मुझे बर्बाद कर दिया। मैं इस धन को बर्बाद कर दूँगा।’ वह जब ग़ुस्से में आते थे, तो बाल्टी में पानी की जगह खालिस इत्र डालकर लोटे से नहाते थे, ताकि पैसा बर्बाद हो। अगर यह अतिरंजित बात है, तब भी उनकी मनोवृत्ति का पता चलता है। वह धन से बहुत ही पीड़ित थे। उनको अपने पूर्वज सेठ अमीनचंद के बारे में पता था, जिनका नाम इतिहास में भारत के ग़द्दार मीर ज़ाफर के साथ शामिल किया जाता है। भारतेंदु अपने पूर्वजों को लेकर बहुत ज़्यादा पीड़ित रहते थे। इस तरह से और भी कई बातें हैं। वह अनेक कुण्ठाओं से वह जीवन-भर ग्रस्त रहे। क्या कुण्ठाएँ थीं? उन कुण्ठाओं से कैसे वह लड़ते थे? इसी को लेकर मैं एक उपन्यास लिख रहा हूँ। यह अलग ढंग का उपन्यास है।

(संगीता पॉल असम विश्वविद्यालय के दीफू परिसर से जयशंकर प्रसाद और शरतचंद्र चटोपाध्याय के उपन्यासों पर पीएचडी कर रही हैं)

डॉ. विजयानन्द का महादेवी वर्मा से साक्षात्कार

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