सूरज मैं तुम्हारा हिस्सा हूँ
मैं अतीत का किस्सा हूँ
मैं आयी हूँ उस गर्भ से
जिस प्रभात के साक्षी तुम
देखो मुझको बेटी समझो
धूप बनाओ आँचल तुम।

रात को जब तुम छुप जाते थे
नींद की गोद में रख जाते थे
नींद टहलने निकल जाती थी
मुझे अकेला छोड़ कर
बीच रात में कितने ही दिन
कमरे कमरे घूमी थी मैं
एक चादर की खोज पर
नहीं मिला जब कुछ ढकने को
कितने ही दिन मैं सोई थी
पलंग की चद्दर ओढ़ कर।

कितने ही दिन मैं सोई थी
पलंग की चद्दर ओढ़ कर।

सूरज मैं तुम्हारा हिस्सा हूँ
मैं अतीत का किस्सा हूँ।

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प्रज्ञा मिश्रा
प्रज्ञा मिश्रा सूचना प्रौद्योगिकी से जुड़ी एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी में कार्यरत हैं। उनका हिन्दी के प्रति प्रेम उन्हें बिहार की मिट्टी और अपने घर के हिन्दीमय वातावरण से मिला, और इसके लिए प्रज्ञा अपने आपको धन्य मानती हैं। हिन्दी के प्रति समर्पित होने के पहले चरण में प्रज्ञा आजकल इग्नू से हिन्दी में एम. ए. कर रही हैं।

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