स्मृतियाँ
चंदनवन की मलय में घुल
स्वयं बन जाना चाहती थीं सुगंध,
एहसासों की तरलता छिड़क
हरा-भरा कर देना चाहती थीं
चंदनवन का हर पीला पत्ता

मलयतरु की फुनगी पर टँगे आसमान में
भर देना चाहती थीं तमाम चटकीले रंग,
उन रंगों के मध्य छाप देना चाहती थीं
निर्द्वंद्व उड़ते पखेरुओं के झुण्ड

पर्वत की सबसे ऊँची चोटी पर कुहनी टिका
आँखों से नापना चाहती थीं सागर का फैलाव,
जलपक्षियों की निर्दोष किलोलों में
भर देना चाहती थीं अपने उन्मुक्त स्वरों को

मासूम स्मृतियाँ
नहीं चाहती थीं
गुलाबों को घेरे काँटों की चुभन,
आसमान में उड़ती मशीनों से डरे पखेरू,
और पहाड़ों, सागरों के बीच खिंचे
नफ़रतों की रेखाएँ

प्रेमपगी स्मृतियाँ
नहीं चाहती थीं लहूलुहान होना
उन बबूलों में उलझकर
जिन्हें समय की मिट्टी में कभी रोपा था तुमने

स्मृतियाँ अब भी प्रतीक्षारत हैं
कि उनके लहू की बूँदे ज़रूर उगा पाएँगी
उन बबूलों के बीच गुलाब
और उस गुलाब की ख़ुशबू तुम्हें खींच लाएगी
तुम्हारे द्वारा विस्मृत उन स्मृतियों में…

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