जब भी कोई अनुभवी लेखक किसी युवा को सम्भावनाशील लेखक या कवि कहता है, वह यही बता रहा होता है कि आप एक रास्ते पर हैं और उस रास्ते का वर्तमान पड़ाव शानदार दिख रहा है। सम्भावना बताए जाने का मतलब सिरमौर कह देना नहीं होता। किसी युवा का रास्ता आगे उस भव्य पहाड़ की सफ़ेद चोटी पर ख़त्म होगा या नहीं, यह बहुत-सी बातों से तय होगा।

यदि आप अपनी शुरुआती सफलता को ही शिखर मान बैठे हैं तो आप आगे बढ़ेंगे कैसे? जो आगे बढ़ेंगे, उन्हें रास्ते में पथरीले रास्तों से पानी बहता मिलेगा जिसमें पैरों के पास से साँप सर्र से गुज़रते होंगे। बीच-बीच में ‘राइटर्स ब्लॉक’ के सहरा भी आएँगे। साँप इस सहरा की रेत में भी होंगे। हर बार डसे जाने से भी आपको बचना है।

यदि किसी मुक़ाम पर आप मान भी लें कि आप लेखन की उत्कृष्टता की सीमा पर हैं तो आप इस पर बने कैसे रहेंगे? आपके सामने चुनौतियाँ होंगीं। बढ़ती हुई उम्र और बदलते समाज के साथ आपका सच बदलेगा। सच हर बार सार्वभौमिक नहीं होता, कभी-कभी व्यक्तिपरक भी होता है। आपकी रचनाओं के बिम्ब बार-बार इस्तेमाल होकर, घिसकर पुराने पड़ जाएँगे। बचपन से जवानी तक बटोरा हुआ सारा सांद्र अनुभव जब आप शुरुआती लेखन में उड़ेल देंगे तो आगे क्या करेंगे? जवाब है, यात्राएँ। ढेर सारी यात्राएँ। अपने भीतर और बाहर, दोनों। यह भी मानना होगा कि व्यक्ति किसी से पूरी तरह सहमत नहीं हो सकता, ख़ुद से भी नहीं। आपके दो साल पुराने स्वरूप की आपके आज के स्वरूप से भेंट हो जाए तो आप दोनों लड़ पड़ेंगे। कला के क्षेत्र में वही बना रह पाएगा, जो बदलते परिवेश में ढल जाएगा। जी, यही वजह है जो अमिताभ बच्चन को आज भी लोकप्रिय बनाती है। वे वक़्त के मुताबिक़ निरंतर समकालीनता को पहचानते रहे और ख़ुद को तराशते भी।

एक और समस्या सामंजस्य बिठाने की भी है। यानी सह-अस्तित्व की कला सीखना। जैसे खाद्य शृंखला में हर कड़ी ज़रूरी है, वैसे ही हर तरह का लेखन भी। यदि सब एक जैसा लिखेंगे तो आपके लिखने का औचित्य ही क्या रह जाएगा? कुछ नए लेखकों को यह भ्रम होता है कि जिस शैली में वे लिख रहे हैं, वही दीर्घजीवी है। यह तो आने वाला समय तय करेगा। जो समय आया ही नहीं, उसकी करवट हम कैसे भाँप लें! यदि इतिहास से सन्दर्भ लेकर भविष्य का अनुमान लगा भी रहे हों तो निर्णय अपने ही पक्ष में क्यों?

एक पाठक के तौर पर मुझे प्रतिरोध की कविता देर से समझ आती है। यह मेरी कमज़ोरी है। स्त्री विमर्श की अधिकाँश कविताओं से मेरे पाठक को संतुष्टि नहीं होती थी तो इस विषय पर मैं गद्य पढ़ने लगा हूँ। जब मुझे प्रतिरोध या स्त्री विमर्श की कविता लिखने के विचार आते हैं तो मैं लम्बे समय तक अनिश्चय की स्थिति में बना रहता हूँ। मैं जानता हूँ कि मेरे भीतर के पाठक की मेरी इन कविताओं पर वही प्रतिक्रिया होगी, फिर भी मैं लिखता हूँ। हर व्यक्ति अपने लेखन में अपना जिया जीवन, अपने क्षेत्र का सांस्कृतिक प्रभाव, अपने पुरखों तक का इतिहास आदि साथ लेकर आता है। मेरे मन में बीज बन उभरे विचार तभी उस वांछित मुकाम तक पहुँच पाएँगे जब उन्हें मेरे मन से ही खाद, पानी और मिट्टी मिले। उन्हें मैं किसी को गोद तो नहीं दे सकता।

जनवादी कविता के साथ-साथ प्रेम कविता ने आम जनता, ख़ास तौर पर युवा पाठकों को साहित्य से जोड़ा है। नफ़रत के इस दौर में भी कुछ लोग प्रेम कविताओं को ग़ैर-ज़रूरी मानते हैं। उन्हें इसी तरह के आरोपों का सामना करने पर पॉल मैकार्टनी के लिखे गीत के ये बोल पढ़ने चाहिए—

“तुम सोचते हो कि दुनिया में पर्याप्त प्रेम गीत हैं
मैं अपने चारों तरफ़ देखता हूँ और पाता हूँ कि ऐसा नहीं है
कुछ लोग दुनिया को बुद्धू प्रेम गीतों से भर देना चाहते हैं
इसमें बुरा क्या है?”

क्या आप उल्कापिंड बनना चाहते हैं? एकाएक चमक बिखेरकर नष्ट हो जाता हुआ? मैं कहूँगा कि आपको ग्रह भी नहीं बनना चाहिए क्योंकि वे सूर्य से उधार पायी चमक को परावर्तित कर बिखरा देते हैं। आप किसी और की नक़ल करके अपनी पहचान नहीं बना सकते। जैसे ट्विटर पर ज़्यादातर हिंदी लिखने वाले गुलज़ार या किसी अन्य की नक़ल करते हैं। उन्हें पढ़कर कुछ समय बाद गुलज़ार या कोई और ही याद रह जाता है। आपको तारा बनने की कोशिश करनी चाहिए और ज़रूरी नहीं कि सबसे चमकदार। हो सकता है कि जिस तारे की चमक आपको धरती से सबसे ज़्यादा नज़र आ रही हो, असल में वह कम चमकीला हो। आप तारा बनेंगे तो आपको अपनी चमक का सही अंदाज़ा हो जाएगा।

अति आत्मविश्वास से इतर एक दूसरी समस्या भी है जिससे आज का हर युवा (सिर्फ़ लेखक नहीं) जूझ रहा है, वह है आत्म-संदेह। जब मैं कविता में नया आया था, मुझे लगता था कि साहित्य में एक संगठनात्मक तंत्र है जो यह तय करता है कि कोई रचना सबके लिए अच्छी होगी या बुरी। बहुत कम रचनाएँ ऐसी होती हैं जो लगभग सबके अनुसार अच्छी या बुरी हों। आम तौर पर रचनाओं का सच व्यक्तिपरक होता है। किसी भी कला के क्षेत्र में ‘मुंडे-मुंडे मतिर्भिन्ना, तुंडे-तुंडे सरस्वती’ का सिद्धांत काम करता है। मैं यहाँ सच्चे आँकलन का ज़िक्र कर रहा हूँ, साहित्य की राजनीति की बात बिलकुल नहीं। कोई आपके लिखे को कमज़ोर बताए तो आपको अपना मूल्याँकन करना है, तटस्थ मूल्याँकन। हर बार रचना ही कमज़ोर हो, ऐसा भी नहीं। बस आप एक दूसरी पसंद रखने वाले व्यक्ति से वाबस्ता थे। यहीं वह बात मौजूँ हो जाती है, ऐसा तारा बनने की जिसे अपनी चमक का सही पता हो। हालाँकि लेखक को समय-समय पर यह जाँचना होगा कि उसके और पाठक के बीच कोई धूल तो नहीं आ गयी, जिसने धुंधला कर दिया हो उसकी रचना का प्रभाव। एक उदाहरण देना चाहूँगा—

अप्रैल 2020 में काफ़ी बार प्रयास करने के बाद ‘सदानीरा’ में मेरी कविताएँ प्रकाशित हुईं। कुछ लोगों ने उनकी प्रशंसा की, वहीं एक आलोचक ने उन्हीं कविताओं को पढ़कर कहा कि मैं लम्बी रेस का घोड़ा नहीं हूँ। मैं सीख रहा हूँ आलोचना को हज़म करना और यह जाँचना भी कि वह कब सही है। आँकलन करने से मुझे उन कविताओं में कमी नहीं नज़र आयी पर मैंने पाया कि कुछ और लिखी जा रही रचनाओं में कुछ और धैर्य बरतना होगा।

आत्म-संदेह के पीछे आलोचना के डर के साथ-साथ किसी हद तक धैर्य की कमी भी है ही। आजकल इंटरनेट पर ख़ूब ट्रॉलिंग करने वाली युवा पीढ़ी भी दरअसल आत्म-संदेह के मनोविज्ञान से राब्ता रखती है। यह एक ऐसा दौर है जहाँ हर रोज़ सोशल मीडिआ पर वैलिडेशन पाने की होड़ होती है। जब कुछ नहीं सूझता तो इतने सारे जवान लोगों की भीड़ में से कुछ धैर्यहीन युवा अलग दिखने की चाहत में, पहले से स्थापित व्यक्तियों का मज़ाक़ बनाकर स्वयं को स्थापित करने की फ़ौरी कोशिश करते हैं। इसी को वर्तमान युग में ऑनलाइन ट्रॉलिंग कहा जाता है। सच्चाई यह है कि बाहर शेर की तरह गुर्राते हुए ये लोग भीतर से असुरक्षित महसूस कर रहे होते हैं। इनमें से अधिकांश इंसोम्निया का शिकार भी हैं। कभी ट्विटर पर जाइए, ये ट्रॉल्स देर रात को ज़्यादा सक्रिय होते हैं।

अति आत्मविश्वास और आत्म-संदेह के बीच एक बहुत पतली डोरी है। डोरी के इस तरफ़ आप ख़ुशफ़हमी के बादल में उड़ जाएँगे और उस तरफ़ संदेह की अंधेरी खाई में गिर जाएँगे। व्यक्तिगत तौर पर मैं दोनों ही चीज़ों का सामना करता हूँ। तारों और ग्रहों के शोध का मेरा काम ऐसा है, जिसमें महीनों तक मैं नालायक-सा महसूस करता हूँ, जब किसी समस्या पर पेंच फँसा हुआ हो। कभी-कभी मैं किसी ग्रह के मौजूद होने की सम्भावना तलाश रहा होता हूँ और ऐसे समीकरण पर फँस जाता हूँ, जिसके बारे में मदद करने वाला सैकड़ों किलोमीटर दूर तक कोई नहीं होता। ऐसे में किसी पत्रिका में छपी कविताओं पर मिली प्रशंसा मुझे आत्म-संदेह से निकालती है। पर, बाहर का यह रास्ता भी फिसलन भरा होता है। एक मरहम की तरह मिली इस प्रशंसा में ही खो नहीं जाना होता। काम पर भी लौटना है, अपनी कविता की रूह भी निरंतर टटोलनी है और उसे सजीव रखना है।

एक तरीक़ा है जो मैं जीवन में संतुलन पाने के लिए कभी-कभी अपनाता हूँ। जब मैं निराश होता हूँ तो गूगल पर अपना नाम तलाश कर अपना अब तक का किया-धरा देख लेता हूँ और जब हवा में उड़ने लगता हूँ तो अपने से बेहतर लोगों का नाम तलाश करता हूँ।

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देवेश पथ सारिया
बतौर रचनाकार मैं मुख्य रूप से हिन्दी कवि हूं। अनुवाद कार्य एवं कथेतर-गद्य लेखन में भी कुछ रुचि रखता हूँ। साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशन: हंस, वागर्थ, कादंबिनी, कथादेश, कथाक्रम, पाखी, आजकल, परिकथा, समयांतर, अकार, बया, बनास जन, जनपथ, समावर्तन, नया पथ, आधारशिला, प्रगतिशील वसुधा, दोआबा, अक्षर पर्व, परिंदे, मंतव्य, कृति ओर, शुक्रवार साहित्यिक वार्षिकी, ककसाड़, उम्मीद, कला समय, रेतपथ, पुष्पगंधा आदि। समाचार पत्रों में प्रकाशन: राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर, दि सन्डे पोस्ट। वेब प्रकाशन: सदानीरा, जानकीपुल, पोषम पा, अनुनाद, बिजूका, समकालीन जनमत, शब्दांकन, कारवां, अथाई। सम्प्रति: ताइवान में खगोल शास्त्र में पोस्ट डाक्टरल शोधार्थी। मूल रूप से राजस्थान के राजगढ़ (अलवर) से सम्बन्ध। ई-मेल: [email protected]