‘Sone Se Pehle’, a poem by Nirmal Gupt

सोने से पहले
किसी सपने को याद नहीं करता
किसी प्रार्थना के फलीभूत हो जाने की
कोई ग़लतफ़हमी नहीं पालता
निविड़ अंधकार की खिड़की से
रोशनी की यादें नहीं आतीं

सो जाने की उम्मीद में
नींद में बेधड़क चलने का
कोई मंसूबा नहीं बाँधता
भीतर के सन्नाटे में
हौले-हौले बजती जलतरंग
सुबह का इंतजार नहीं करती

सोने से ठीक पहले
खोये हुए पंखों की तलाश
शुरू होती है नये सिरे से
कामनाओं की ऊन के गोले
बन जाते हैं उलझ-सुलझकर
रंगों का कोलाज

सो जाने के बाद
उतारता हूँ दिन वाले मुखौटे
चेहरे से खुरच-खुरचकर
और लहूलुहान मन लिए
देर रात तक करता हूँ
अपने से फालतू सवाल

सोते समय
याद आती है मुझे गुलेल और
उसकी वजह से मरी चिड़िया
अपनी बचकानी क्रूरता पर
हड़बड़ाकर करवट लेता
रचता हूँ गहरी नींद में उतरने का स्वांग!

यह भी पढ़ें: निर्मल गुप्त की कविता ‘साठ पार का आदमी’

Recommended Book:

Previous articleअपील
Next articleदिवास्वप्न
निर्मल गुप्त
बंगाल में जन्म ,रहना सहना उत्तर प्रदेश के मेरठ में . व्यंग्य लेखन भी .अब तक कविता की दो किताबें -मैं ज़रा जल्दी में हूँ और वक्त का अजायबघर छप चुकी हैं . दो व्यंग्य लेखों के संकलन इस बहुरुपिया समय में तथा हैंगर में टंगा एंगर प्रकाशित. कुछ कहानियों और कविताओं का अंग्रेजी तथा अन्य भाषाओं में अनुवाद . सम्पर्क : [email protected]

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here