इस चेहरे पर जीवन-भर की कमाई दिखती है
पहले दुःख की एक परत
फिर एक परत प्रसन्नता की
सहनशीलता की एक और परत
एक परत सुन्दरता
कितनी किताबें यहाँ इकट्ठा हैं
दुनिया को बेहतर बनाने का इरादा
और ख़ुशी को बचा लेने की ज़िद

एक हँसी है जो पछतावे जैसी है
और मायूसी उम्मीद की तरह
एक सरलता है जो सिर्फ़ झुकना जानती है
एक घृणा जो कभी प्रेम का विरोध नहीं करती

आईने की तरह है स्त्री का चेहरा
जिसमें पुरुष अपना चेहरा देखता है
बाल सँवारता है, मुँह बिचकाता है
अपने ताक़तवर होने की शर्म छिपाता है

इस चेहरे पर जड़ें उगी हुई हैं
पत्तियाँ और लतरें फैली हुई हैं
दो-चार फूल हैं अचानक आयी हुई ख़ुशी के
यहाँ कभी-कभी सूरज जैसी एक लपट दिखती है
और फिर एक बड़ी-सी ख़ाली जगह!

अनीता वर्मा की कविता 'अभी'

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