जब कि बरसों बाद
स्त्रियों के हिस्से आया है
पुरुषों के संग रहने का सुख
तो फिर आँकड़े क्यूँ कह रहे हैं
कि स्त्रियाँ सबसे अधिक उदास इन दिनों ही हैं
कि ये कौन शिकायतें दर्ज करा रहा
बन्द घरों में हिंसा की

कि घरेलू कार्यों में सिद्ध स्त्रियों के
कौन से कार्यों से पहुँच रही होगी
चोट तुम्हें
कि तुम्हारे खाने में स्वाद का संयोजन तो ठीक होगा ना
कि बरसों से सधे हाथों से
चूक होने की सम्भावना कम ही है
फिर ऐसा क्या जो
तुम्हारे माथे पर बल ला देता हो
और तुम्हारा क्रोध पर क़ाबू न रह पाता हो
बिफर पड़ते होंगे तुम
और आग बबूला हो
उठा लेते होंगे हाथ
कि उधेड़ देते होंगे बखिया
स्त्री के मन पर कढ़े कंगूरों की
कि आ जाता होगा तुम्हें
इत्मिनान उसकी रुँधती हुई
आवाज़ को सुनकर

इससे इतर कुछ चुप स्त्रियाँ भी हैं
जिन्होंने नहीं लिखायी रपट
जिनके हिस्से ऐसे पुरुष आए
जिन्होंने चुप की मार से
स्त्रियों के पंख कतर डाले
पर फिर भी वो चुप स्त्रियाँ
अपनी क्षमता से अधिक
श्रम साधती रहीं
और नहीं कर पायीं हौसला
घर की चार दीवारी लाँघने का
हालाँकि उनके शरीर पर कोई निशान नहीं थे
पर मन पर पड़े घाव के रिसने
का दर्द उनकी आँखों में देखा जा सकता है

ओ पुरुष ये कैसा पुरुषत्व है तुम्हारा कि
जो स्त्री के प्रेम
के बदले करते हो हर बार
उसे परास्त पीड़ा पहुँचाकर
और स्त्रियाँ हैं कि
हर शिनाख़्त के बाद भी
बचा लेती हैं अपने भीतर प्रेम का टुकड़ा
इस आस के साथ
कि वक़्त का पहिया एक जगह ठहरता नहीं
और सदियों सदियों से इसी आस के साथ
सलीब पर ढोती आ रही हैं
अपनी देह

इतिहास में कहीं दर्ज नहीं
इन स्त्रियों के टूटे स्वाभिमान का लेखा-जोखा
न दर्ज हैं आँसू
कि जिनकी नमी
धुंधला कर दे
इतिहास में लिखे अक्षरों को!

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