सुबह जवान है
उजली है
आपाधापी में व्यस्त है
सुबह के पास नहीं है
पूरे दिन का अनुभव, इसलिए
तारुण्य में मस्त है

समय की हर ईकाई से
कदम कदम की रुखाई से
करती है संघर्ष
तपती हुई धूप में
उड़ जाता है तारुण्य
मन्द हो जाता है हर्ष

आ जाती है सांझ
किसी थके पथिक की भाँति
अपनी परछाई में सुस्ताती है
दिन भर के अत्याचार से
बुझते बुझते मद्धिम होते
रात्रि में खो जाती है!

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