‘Subah’, poems by Puru Malav

1

सुबह किसी उम्मीद की तरह आती है,
आसमान के आँगन को गेरू से पोतकर
रात सोने चली गई,
ठुमकता हुआ सूरज आ बैठा है
लीपे-पुते आँगन के बीच,
लहरों की तरह उठती-गिरती चिड़ियों की क़तारें चिंहुक उठीं-
ख़ुश-आमदीद! ख़ुश-आमदीद!

2

सुबह आती है रात के पहाड़ को चीरकर,
समूचा शहर लिपटा है सफ़ेद चादर में
धरती से आकाश तक,
भ्रम की तरह फैला है कोहरा
ख़ुद के सिवा और कुछ दिखता भी नहीं,
धीरे-धीरे सुबह खींचती है कोहरे की चादर
धीरे-धीरे भ्रम छँटता है
नहा उठता है सारा शहर सच की रोशनी में।

3

स्याह आकाश में
सूरज एक ढेले की तरह आकर गिरता
तिलमिला उठता है अंधकार उसकी मार से
और टूट कर बिखर जाता है रात का तिलिस्म

4

सुबह एक प्रतिरोध है
रात के षडयंत्र के विरुद्ध,
एक तमाचा है उनके मुँह पर
जो सत्ता के मद में चूर हैं
जो कहते हैं कि हम अपने फ़ैसलों से
इंच भर भी पीछे नहीं हटेंगे,
सुबह एक उम्मीद है उन लोगों की ख़ातिर
जो यक़ीन रखते हैं
कि हर रात के बाद सुबह होती है,
रात होती है जितनी स्याह और लम्बी
सुबह उतनी ही रोशन होती है।

5

सुबह ही के इंतज़ार में बैठे हैं
लोग सदियों से अलाव जलाकर,
हर कोई लिए बैठा है
अपने-अपने दुःख की गठरी,
लोग सिमट आए हैं पास-पास,
साझे दुःख ने और क़रीब ला दिया है उनको।

6

दिन दागता रहता है
दिन-भर दुःख की गर्म सलाख़ें,
रात, रात-भर नमक छिड़कती रहती है उन पर,
सुबह एक-एक कर भर देती है सारे घाव।

7

वो सुबह कितनी ख़ूबसूरत होती है
जिस सुबह देखता हूँ
बच्चों को स्कूल जाते हुए।
वह सुबह कितनी मनहूस होती है
जिस सुबह देखता हूँ
बच्चों को काम पर जाते हुए।

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