सुनो समाज
मेरे तुम्हारे बीच लगी है एक दौड़-सी
ना जाने कब किसने लिख दी शर्तें इस होड़ की
भाग रहे हैं हम अपने-अपने दायरों में
फ़र्क़ बस इतना है
तुम्हारे दायरे अदृश्य हैं, एच्छिक हैं और मेरे…
ये शायद तुम्हें ठीक तरह मालूम होंगे क्योंकि
ना जाने कब किसने इसका हक़दार तुम्हें बना दिया
तो ठीक है मेरे दायरे तय करने वाले तुम सही
पर मेरे पैरों की रफ़्तार मैं तय करती हूँ
गिरने पर भी उठ खड़े होने की दृढ़ता मैं तय करती हूँ
पथरीले रास्तों को मुँह चिढ़ाने का अंदाज़ मैं तय करती हूँ
अँधेरे जो डराएँ तो उन्हें आँखें दिखाने का हौसला मैं तय करती हूँ
‘अरे लड़कियों को ऐसा नहीं करना चाहिए’ की गूँज को हवा में उड़ाने का रोमांच मैं तय करती हूँ
मेरे ख़्वाबों पर ‘तहज़ीब’ का तमग़ा लगाने वालों, सुनो, मेरा आसमान मैं तय करती हूँ
मेरी बनावट पर उँगली उठाने वालों, सुनो, मेरा आइना मैं तय करती हूँ
मुझे मर्यादा और इज़्ज़त के गहने देने वालों, सुनो, मेरे स्वाभिमान का शृंगार मैं तय करती हूँ
फिर चाहे दायरे तुमने जो भी लिखे हों
मेरी उम्र के, रिश्तों के, फ़ैसलों के, मर्ज़ियों के, शिकायतों के, विश्वास के, कटाक्ष के, चरित्र के और अधिकारों के भी
पर सुनो समाज
तुम्हारे इन दायरों से नज़रें मिलाकर ‘मैं’ को परिभाषित करने का साहस मैं तय करती हूँ…