एक पथरीले चेहरे वाली आग चबाती है किसी झोंपड़ी को
कर्णभेदी शोर के साथ
हवाओं को छाती पीटकर ललकारते हुए
कोई बाघ गर्दन दबाता है अपने शिकार की
हड्डियों का चटखना लाउडस्पीकर पर लगाए
कोई शरीर विघटित होता है
नाक को बींध देने वाली दुर्गन्ध के साथ

देखने वालों की आँखों में उतरे भय का
स्वाद अपनी जीभ पर लुढ़काते हुए
आँखों को टिकाए लक्ष्य
वो आगे बढ़ता है
वो कोई आम दानव नहीं है
जब तुम उससे आँखें मिलाते हो तो वो सीधे
घुस जाता है तुम्हारी हड्डियों में
और रेंगता हुआ खाता है तुम्हें सालों तक
तुम्हारी इच्छा के विरुद्ध ले जाता है तुम्हें
मजबूरी के डामरी दलदल में…

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आशीष बिहानी
मैं बीकानेर, राजस्थान से हूँ और कोशिकीय एवं आणविक जीव विज्ञान केंद्र से पीएचडी कर रहा हूँ. मेरा कविता संग्रह "अन्धकार के धागे" (हिन्द-युग्म प्रकाशन, २०१५) अमेज़न पर उपलब्ध है. इसके अलावा मेरी कविताएँ कई पत्रिकाओं और ई-पत्रों पर छपीं हैं. https://bhoobhransh.blogspot.com/

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