जन्म से पहले मनुष्य ने जो स्वप्न देखा,
शायद यह संसार उसी स्वप्न से उत्पन्न हुआ होगा!
पहले उसने स्वप्न देखा होगा चाँद का, सूरज का,
फिर पहाड़ों, नदियों, और वृक्ष के होने का सपना देखा होगा

उसने सोचा होगा कि एक आँगन हो,
और रौशनी का एक थाल उसके आँगन में हमेशा लटका रहे,
उस वक़्त हुआ होगा चांद का निर्माण!

उसने सोचा होगा कि कई टिमटिमाती बिंदियाँ उसकी छत को सँवारें,
तब बने होंगे अनगिनत तारे!

उसने सोचा होगा कि कुछ तो ऐसा हो
जिसकी सीढ़ी बनाकर, अनंत के पार देखा जा सके
तब हुआ होगा गगनचुम्बी पहाड़ों का निर्माण!

इस दुनिया में कुछ भी यूँही नहीं है
यह दुनिया भी नहीं
यदि हर फल का कारण है
तो उत्पत्ति का भी होगा!
मनुष्य अगर कर्म से बंधा है,
तो मुझे लगता है,
कि यह दुनिया निश्चित ही स्वप्न से बंधी होगी!

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