मरने के बाद मैं सीधा यमलोक पहुँचा। वहाँ के रंग-ढंग देखकर थोड़ा आश्चर्यचकित हुआ। सबसे बड़ा दुःख यह देखकर हुआ कि मेरे मोहल्ले के ‘सामाजिक ठेकेदार’ न जाने कैसे यमलोक के चित्रगुप्त बन गए हैं।

ओरिएंटेशन प्रोग्राम में चित्रगुप्त ने बताया कि मुझे स्वर्ग-लोक मिल गया है। बताया गया कि स्वर्ग जाने से पहले नरक का एक चक्कर लगाना ज़रूरी होता है। मैंने कहा, “सर, इसकी क्या ज़रूरत है?”

सुनकर चित्रगुप्त तुरंत अमिताभ बच्चन वाले मोड में आ गए। बोले, “परम्परा, प्रतिष्ठा और अनुशासन इस यमलोक के तीन स्तम्भ हैं। ये वो आदर्श हैं, जिनसे हम आपका मरने के बाद आने वाला कल बनाते हैं।”

फिर क्या, मैं भी उनके साथ हो लिया।

चित्रगुप्त मुझे पहले एक पिंजड़े के पास ले गए। उस पिंजड़े में महिलाएँ थीं। चित्रगुप्त बोले, “पृथ्वी पर ये महिलाएँ घरेलू हिंसा, रेप आदि क्राइम की शिकार हुईं। पर इसके लिए ये ख़ुद ही ज़िम्मेदार हैं। इन्होंने लक्ष्मण रेखाएँ पार की थीं। उठने, बैठने, बोलने, पहनावे का सलीक़ा नहीं था।”

मैंने कहा, “मतलब पीड़ित भी यही हैं और अपनी पीड़ा के लिए ज़िम्मेदार भी ख़ुद ही हैं।”

अचानक सभी महिलाएँ चिल्ला उठीं— “मरते भी हम हैं और मारते भी हम हैं।”

फिर चित्रगुप्त मुझे दूसरे पिजड़े के पास ले गए। बोले, “ये ग़रीब लोग हैं। बीमारी से मर गए। पर इसके लिए ये लोग ख़ुद ही ज़िम्मेदार हैं। अपने रहने की जगह के आस-पास साफ़-सफ़ाई नहीं रखते। साफ़ पानी नहीं पीते। गन्दगी इनके जीवन का हिस्सा बन चुकी है। गन्दगी से बीमारियाँ पनपती हैं और बीमारी से ये मरते हैं।”

मैंने कहा, “वही गन्दगी जो इंडस्ट्रीज़ से काले धुएँ या ज़हरीले पानी के रूप में निकलती है और फिर घूम फिरकर इन्हीं के घरों के आस-पास जमा हो जाती है?”

तभी पिजड़ा फिर उन्हीं आवाज़ों से गूँज उठा— “मरते भी हम हैं और मारते भी हम हैं।”

आगे उन्होंने मुझे माइग्रेंट लेबरर्स के पिंजड़े से परिचित कराया। कहने लगे, “इनमें से कुछ भूख से मर गए। कुछ भगदड़ में मरे। कुछ महामारी से मरे। पर इसके लिए भी ये ख़ुद ही ज़िम्मेदार हैं। इन्हें बोला गया था कि जहाँ हो वहीं रहना, पर ये नहीं माने।”

इस पर मैं कुछ कहता, उससे पहले ही वो सब एक साथ चिल्ला उठे— “मरते भी हम हैं और मारते भी हम हैं।”

इस प्रकार मेरा नरक का भ्रमण पूरा हुआ। अब मुझे स्वर्ग के एक कक्ष में टिका दिया गया था। स्वर्ग ऐश और आराम से भरपूर था। हर जगह साफ़-सफ़ाई थी। सेवा के लिए नौकर-चाकर भी दिए गए थे। सोने के लिए मखमली गद्दा दिया गया था। सभी सुविधाओं के बावजूद अब स्वर्ग, स्वर्ग जैसे सुख की अनुभूति नहीं दे रहा था।

वहाँ भी अब नींद अच्छे से नहीं आती थी क्योंकि रात-भर नरक से ख़ौफ़नाक आवाज़ें आती रहती थीं। सभी पिजड़े एक साथ चिल्लाते थे—

“मरते भी हम हैं, और मारते भी हम ही हैं।”

“मरते भी हम हैं, और मारते भी हम ही हैं।”

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