पढ़ रहा था कल तुम्हारे काव्य को

और मेरे बिस्तरे के पास
नीरव टिमटिमाते दीप के
नीचे अँधेरे में घिरे
भोले अँधेरे में घिरे सारे सुझाव, गहनतम संकेत!
जाने क्या बताते थे!
(अरे! मासूम दीवालें बिचारी
देखती ही रह गयीं—
वह तुम्हारी वास्तविकता मात्र है प्रस्ताव
या कुछ और भी?)
बरसात के कीड़े (पुरानी खीझ-से, चिढ़-से)
कहीं से आ घिरे
इस टिमटिमाते दीप के चहुँ ओर पहुँचे भाव लेकर नया
आबादी नयी ‘छोटे’ सवालों की।
मुँह पर दाग़ चेचक के गिने किसने?
सवालों ने गिने (पर गिन न पाए) रात के
सौ, चमचमाते दाग़ मुँह पर के।
यहाँ दीवाल पर
कुछ उँगलियों के मौन छाया-नृत्य
गहरे अर्थ के अति-भय-जनक विस्तार
धीरे से सुझा
फिर खो गये
औ’ व्यंग्य-मुद्राएँ कई भेगी निगाहों की नयी
दीखीं कि मेरे प्राण
गहरी खीझ उकताहटभरी झखमार से अकुला उठे।
सौ चीटियाँ रेंगीं विचारों की
उठाने लाश भारी एक झींगुर की सहज
(कदाचित् मात्र मूर्छित पीठ के बल था पड़ा)
लेकिन नहीं! झींगुर नहीं है वह
भयानक वास्तविकता है
बड़ी वीरान मुसकाहट, बड़ी गुँजान आँखों में
भयंकर व्यर्थता का भान
उकताया हुआ सुनसान छाया है।
बौद्धिक कल्पनाओं की सफ़ेदी में सफ़ाई में
सिमिट लिपटी हुई
वह ऊब, उकताहट, बगासी, ग्लानि
वह खल्वाट जीवन की स्वचेतन-सी उदासी की
निरर्थक वास्तविकता मौन
काँटेदार पंजे हरी थूहर के, कँटीली वासना के,
गोल गोलक-से, गुलाबी फूल।
बौनी घास के ऊजड़ कठिन मैदान।

पढ़ रहा था कल तुम्हारे काव्य को

और मेरे बिस्तरे के पास
नीरव टिमटिमाते दीप के
भोले अँधेरे में दिखे
भोले अँधेरे में घिरे सारे सुझाव! गहनतम संकेत!

हमारे यहाँ भी है ह्रास

काली सील खा-खाकर पलस्तर गिर रहे
प्राचीर की प्राचीन जंगली अस्थियाँ हैं खुल गयीं
लेकिन उन्हीं पर घास! हरियाली नयी!
गुँजान स्वार्थों की घमण्डी मूँछ है लहरा रही
सूनी हवाओं में।
उसी प्राचीर के ऊँचे किनारे पर
(कि काई के भयानक मखमली नक़्शों-सजे
काले कगार पर)।

साभार: किताब: मुक्तिबोध रचनावली (भाग 1) | प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन

मुक्तिबोध का लेख 'जनता का साहित्य किसे कहते हैं'

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गजानन माधव मुक्तिबोध
गजानन माधव मुक्तिबोध (१३ नवंबर १९१७ - ११ सितंबर १९६४) हिन्दी साहित्य के प्रमुख कवि, आलोचक, निबंधकार, कहानीकार तथा उपन्यासकार थे। उन्हें प्रगतिशील कविता और नयी कविता के बीच का एक सेतु भी माना जाता है।

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