तब समझ लेना

‘Tab Samajh Lena’, a poem by Nirmal Gupt

रोटी का पहला कौर तोड़ते हुए
जब खेत-खलिहान में लहलहाती
दूध से भरी गेहूँ की बालियाँ याद न आएँ,
गर्म दूध को पीने से पहले
फूँक मारकर उसे ठण्डाते हुए
गाय के थन में जीवन टटोलते
बछड़े का अक्स सामने न उभरे,
पानी पीने के लिए
गिलास को मुँह से लगाते ही
कोसों दूर से मटकी भर जल लाती
बहुरंगी ओढ़नियों से छन कर आता
पसीने से लथपथ संगीत सुनायी न दे,
रात के घुप्प अँधेरे में
सुदूर गाँव से आती
सिसकियाँ और मनुहार
सुनायी देनी क़तई बंद हो जाएँ,
गर्मागर्म जलेबी खाते हुए
गाँव वाली जंगल जलेबी का
मीठा कसैला स्वाद जिह्वा पर
ख़ुदबख़ुद न तैर जाए,
तब समझ लेना
तुम चले आए हो
अपने घर बार से दूर
इतनी दूर
जहाँ से वापस लौट आने की
अमूमन कोई गुंजाइश नहीं हुआ करतीl

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