Tag: bird

Bird, Water

कुछ कह रही थी छोटी चिड़िया

सबेरे-सबेरे कुछ कह रही थी छोटी चिड़िया गली सूनी थी सूरज चढ़ा नहीं था कोई स्तवन था किसी देवता का जो भरपूर देता हो अन्न और भोज्य अपनी स्तुति से...
Bird

कौतुक-कथा

धूप चाहती थी, बारिश चाहती थी, चाहते थे ठेकेदार कि यह बेशक़ीमती पेड़ सूख जाए चोर, अपराधी, तस्कर, हत्यारे, मंत्री के रिश्तेदार फ़िल्म ऐक्टर, पुरोहित, वे सब जो...
Dushyant Kumar

क़ैद परिंदे का बयान

तुमको अचरज है—मैं जीवित हूँ! उनको अचरज है—मैं जीवित हूँ! मुझको अचरज है—मैं जीवित हूँ! लेकिन मैं इसीलिए जीवित नहीं हूँ— मुझे मृत्यु से दुराव था, यह जीवन जीने...
Rag Ranjan

उसने मुझे पीला रंग सिखाया

उसने मुझे पीला रंग सिखाया और मुझे दिखायी दिए जीवन के धूसर रंगों के बीचोबीच रू ब रू दो दहकते हुए पीले सूर्यमुखी एक से दूसरे के...
Sharad Billore

भाषा

पृथ्वी के अन्दर के सार में से फूटकर निकलती हुई एक भाषा है बीज के अँकुराने की। तिनके बटोर-बटोरकर टहनियों के बीच घोंसला बुने जाने की भी एक भाषा है। तुम्हारे...
Subhadra Kumari Chauhan

कोयल

देखो कोयल काली है पर मीठी है इसकी बोली, इसने ही तो कूक-कूककर आमों में मिश्री घोली। कोयल! कोयल! सच बतलाना क्या संदेसा लायी हो, बहुत दिनों के बाद आज...
Bhagwat Rawat

चिड़ियों को पता नहीं

चिड़ियों को पता नहीं कि वे कितनी तेज़ी से प्रवेश कर रही हैं कविताओं में। इन अपने दिनों में खासकर उन्हें चहचहाना था उड़ानें भरनी थीं और घंटों गरदन में...
Bird

खोया हुआ जंगल

खिड़की के बाहर जंगल था खिड़की पर चिड़िया बैठी थी मैंने यह पूछा चिड़िया से— "चिड़िया-चिड़िया, कितना जंगल?" चिड़िया ने तब आँख नचायी चिड़िया ने तब पंख फुलाए मेरी तरफ़...
Two Faces, Closed Eyes, Abstract

कुल्हाड़ी

यहाँ लकड़ी कटती है लगातार थोड़ा-थोड़ा आदमी भी कटता है किसी की उम्र कट जाती है और पड़ी होती धूल में टुकड़े की तरह शोर से भरी इस गली में कहने...
Kedarnath Agarwal

वह चिड़िया जो

वह चिड़िया जो— चोंच मारकर दूध-भरे जुण्डी के दाने रुचि से, रस से खा लेती है वह छोटी सन्तोषी चिड़िया नीले पंखों वाली मैं हूँ मुझे अन्‍न से बहुत प्‍यार है। वह चिड़िया...
Ramdhari Singh Dinkar

भगवान के डाकिए

पक्षी और बादल, ये भगवान के डाकिए हैं जो एक महादेश से दूसरे महादेश को जाते हैं— हम तो समझ नहीं पाते हैं मगर उनकी लायी चिट्ठियाँ पेड़, पौधे, पानी और...
Rohit Thakur

कविताएँ — मई 2020 (दूसरा भाग)

मैना निष्ठुर दिनों में देखा है कोई नहीं आता। मैना की ही बात करता हूँ कई मौसमों के बीत जाने पर आयी है मैं तो बच गया— विस्मृत हो रही...

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RECENT POSTS

Corona, Covid

उसकी आँखें खुली रहनी चाहिए थीं

(कोरोना से गुज़र गई एक अपरिचित की फ़ेसबुक प्रोफ़ाइल से गुज़रते हुए) 8 मई, 2021 सत्ता है मछली की आँख और दोनों कर्ता-धर्ता अर्जुन और 'ठाकुर' बने थे चूक...
Usha Priyamvada

छुट्टी का दिन

पड़ोस के फ़्लैट में छोटे बच्चे के चीख़-चीख़कर रोने से माया की नींद टूट गई। उसने अलसाई पलकें खोलकर घड़ी देखी, पौने छह बजे...
Sudha Arora

अकेली औरत का हँसना

अकेली औरत ख़ुद से ख़ुद को छिपाती है। होंठों के बीच क़ैद पड़ी हँसी को खींचकर जबरन हँसती है और हँसी बीच रास्ते ही टूट जाती है... अकेली औरत...
Shamsher Bahadur Singh

चुका भी हूँ मैं नहीं

चुका भी हूँ मैं नहीं कहाँ किया मैनें प्रेम अभी। जब करूँगा प्रेम पिघल उठेंगे युगों के भूधर उफन उठेंगे सात सागर। किन्तु मैं हूँ मौन आज कहाँ सजे मैनें साज अभी। सरल से भी...
Franz Kafka, Milena Jesenska

मिलेना को लिखे काफ़्का के पत्रों के कुछ अंश

किताब अंश: 'लेटर्स टू मिलेना' अनुवाद: लाखन सिंह प्रिय मिलेना, काश! ऐसा हो कि दुनिया कल ख़त्म हो जाए। तब मैं अगली ही ट्रेन पकड़, वियना में...
Woman in front of a door

सुबह

कितना सुन्दर है सुबह का काँच के शीशों से झाँकना इसी ललछौंहे अनछुए स्पर्श से जागती रही हूँ मैं बचपन का अभ्यास इतना सध गया है कि आँखें खुल ही जाती...
Rohit Thakur

सोलेस इन मे

कौन आएगा मई में सांत्वना देने कोई नहीं आएगा समय ने मृत्यु का स्वांग रचा है अगर कोई न आए तो बारिश तुम आना आँसुओं की तरह दो-चार बूँदों की...
Fist, Protest, Dissent

एक छोटी-सी लड़ाई

मुझे लड़नी है एक छोटी-सी लड़ाई एक झूठी लड़ाई में मैं इतना थक गया हूँ कि किसी बड़ी लड़ाई के क़ाबिल नहीं रहा। मुझे लड़ना नहीं अब— किसी...
Saadat Hasan Manto

मंटो

मंटो के मुताल्लिक़ अब तक बहुत कुछ लिखा और कहा जा चुका है। उसके हक़ में कम और ‎ख़िलाफ़ ज़्यादा। ये तहरीरें अगर पेश-ए-नज़र...
Sahir Ludhianvi

ख़ून फिर ख़ून है

ज़ुल्म फिर ज़ुल्म है, बढ़ता है तो मिट जाता है ख़ून फिर ख़ून है, टपकेगा तो जम जाएगा ख़ाक-ए-सहरा पे जमे या कफ़-ए-क़ातिल पे जमे फ़र्क़-ए-इंसाफ़ पे...
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