Tag: Capitalism

Rahul Sankrityayan

तुम्हारी जोंकों की क्षय

जोंकें? — जो अपनी परवरिश के लिए धरती पर मेहनत का सहारा नहीं लेतीं। वे दूसरों के अर्जित ख़ून पर गुज़र करती हैं। मानुषी...
Fahmida Riaz

इस गली के मोड़ पर

इस गली के मोड़ पर इक अज़ीज़ दोस्त ने मेरे अश्क पोंछकर आज मुझसे ये कहा— यूँ न दिल जलाओ तुम लूट-मार का है राज जल रहा है कुल...
Shailendra

इतिहास

खेतों में, खलिहानों में मिल और कारख़ानों में चल-सागर की लहरों में इस उपजाऊ धरती के उत्तप्त गर्भ के अन्दर कीड़ों से रेंगा करते वे ख़ून पसीना करते!वे अन्न-अनाज उगाते वे...
Adam Gondvi

तुम्हारी फ़ाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है

तुम्हारी फ़ाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है मगर ये आँकड़ें झूठे हैं, ये दावा किताबी हैउधर जम्हूरियत का ढोल पीटे जा रहे हैं वो इधर...
Manbahadur Singh

बैल-व्यथा

तुम मुझे हरी चुमकार से घेरकर अपनी व्यवस्था की नाँद में जिस भाषा के भूसे की सानी डाल गए हो— एक खूँटे से बँधा हुआ अपनी नाथ को चाटता...
Ali Sardar Jafri

निवाला

'Niwala', a nazm by Ali Sardar Jafriमाँ है रेशम के कारख़ाने में बाप मसरूफ़ सूती मिल में है कोख से माँ की जब से निकला है बच्चा...
Baba Nagarjuna

मन करता है

'Man Karta Hai', a poem by Baba Nagarjunमन करता है : नंगा होकर कुछ घण्टों तक सागर-तट पर मैं खड़ा रहूँ यों भी क्या कपड़ा मिलता...
Smiling Man, Gamchha, Village, Labour

जिसके संग बाज़ार हो लिया

'Jiske Sang Bazar Ho Liya' a poem by Shiva जिसके संग बाज़ार हो लिया उसका बेड़ा पार हो लिया नौ सौ चूहे खाकर बिल्ला हज को फिर तैयार हो...

दस का पुराना नोट

उम्र यही कोई साठ साल रही होगी। रंग सांवला और बाल पूरे सफेद हो चुके थे। पान खाती थी और पूरे ठसक से चलती...
Rickshaw

बारगेनिंग

"आज एक रिक्शेवाले को सबक सिखा दिया। मुझसे पैसे ऐंठ रहा था, लेकिन मैंने भी उसे रख कर झाड़ दिया कि मैं भी यहीं का हूँ, सब जानता हूँ और बस बीस रुपये में उसे वापस भेज दिया।"

STAY CONNECTED

38,332FansLike
19,561FollowersFollow
27,870FollowersFollow
1,660SubscribersSubscribe

RECENT POSTS

Kedarnath Singh

फ़र्क़ नहीं पड़ता

हर बार लौटकर जब अन्दर प्रवेश करता हूँ मेरा घर चौंककर कहता है 'बधाई'ईश्वर यह कैसा चमत्कार है मैं कहीं भी जाऊँ फिर लौट आता हूँसड़कों पर परिचय-पत्र माँगा...
Naveen Sagar

वह मेरे बिना साथ है

वह उदासी में अपनी उदासी छिपाए है फ़ासला सर झुकाए मेरे और उसके बीच चल रहा हैउसका चेहरा ऐंठी हुई हँसी के जड़वत् आकार में दरका है उसकी आँखें बाहर...
Nurit Zarchi

नूइत ज़ारकी की कविता ‘विचित्रता’

नूइत ज़ारकी इज़राइली कवयित्री हैं जो विभिन्न साहित्य-सम्बन्धी पुरस्कारों से सम्मानित हैं। प्रस्तुत कविता उनकी हीब्रू कविता के तैल गोल्डफ़ाइन द्वारा किए गए अंग्रेज़ी...
Sunset

कितने प्रस्थान

सूरज अधूरी आत्महत्या में उड़ेल आया दिन-भर का चढ़ना उतरते हुए दृश्य को सूर्यास्त कह देना कितना तर्कसंगत है यह संदेहयुक्त है अस्त होने की परिभाषा में कितना अस्त हो जाना दोबारा...
Naresh Mehta

कवच

मैं जानता हूँ तुम्हारा यह डर जो कि स्वाभाविक ही है, कि अगर तुम घर के बाहर पैर निकालोगे तो कहीं वैराट्य का सामना न हो जाए, तुम्हें...
Vishesh Chandra Naman

मैं

मैं एक तीर था जिसे सबने अपने तरकश में शामिल किया किसी ने चलाया नहींमैं एक फूल था टूटने को बेताब सबने मुझे देखा, मेरे रंगों की तारीफ़ की और मैं...
Gaurav Bharti

कविताएँ: नवम्बर 2021

यात्री भ्रम कितना ख़ूबसूरत हो सकता है? इसका एक ही जवाब है मेरे पास कि तुम्हारे होने के भ्रम ने मुझे ज़िन्दा रखातुम्हारे होने के भ्रम में मैंने शहर...
God, Abstract Human

कौन ईश्वर

नहीं है तुम्हारी देह में यह रुधिर जिसके वर्ण में अब ढल रही है दिवा और अँधेरा सालता हैरोज़ थोड़ी मर रही आबादियों में रोज़ थोड़ी बढ़ रही...
Haruki Murakami

हारुकी मुराकामी की कहानी ‘सातवाँ आदमी’

कहानी: 'सातवाँ आदमी' लेखक: हारुकी मुराकामी जापानी से अनुवाद: क्रिस्टोफ़र एलिशन हिन्दी अनुवाद: श्रीविलास सिंह"वह मेरी उम्र के दसवें वर्ष के दौरान सितम्बर का एक अपराह्न था...
Aashika Shivangi Singh

आशिका शिवांगी सिंह की कविताएँ

माँ-पिता प्रेमी-प्रेमिका नहीं बन सके मेरी माँ जब भी कहती है— "प्रेम विवाह ज़्यादा दिन नहीं चलते, टूट जाते हैं" तब अकस्मात ही मुझे याद आने लगते...
कॉपी नहीं, शेयर करें! ;-)