Tag: दलित विमर्श

Malkhan Singh

मुझे ग़ुस्सा आता है

मेरा माँ मैला कमाती थी बाप बेगार करता था और मैं मेहनताने में मिली जूठन को इकट्ठा करता था, खाता था। आज बदलाव इतना आया है कि जोरू मैला...
Om Prakash Valmiki

तब तुम क्या करोगे?

यदि तुम्हें धकेलकर गाँव से बाहर कर दिया जाए पानी तक न लेने दिया जाए कुएँ से दुत्कारा-फटकारा जाए चिलचिलाती दोपहर में कहा जाए तोड़ने को पत्थर काम के बदले दिया जाए खाने...
Tribe, Village, Adivasi, Labour, Tribal, Poor

समानान्तर इतिहास

इतिहास राजपथ का होता है पगडण्डियों का नहीं! सभ्यताएँ बनती हैं इतिहास और सभ्य इतिहास पुरुष! समय उन बेनाम क़दमों का क़ायल नहीं जो अनजान दर्रों जंगलों कछारों पर पगडण्डियों की आदिम लिपि— रचते हैं ये कीचड़-सने कंकड़-पत्थर...
Om Prakash Valmiki

शम्बूक का कटा सिर

जब भी मैंने किसी घने वृक्ष की छाँव में बैठकर घड़ी भर सुस्‍ता लेना चाहा, मेरे कानों में भयानक चीत्‍कारें गूँजने लगीं जैसे हर एक टहनी पर लटकी हो लाखों...
Woman Feet

घर की चौखट से बाहर

दरवाज़े के पीछे परदे की ओट से झाँकती औरत दरवाज़े से बाहर देखती है- गली-मोहल्ला, शहर, संसार! आँख, कान, विचार स्वतन्त्र हैं बन्धन हैं सिर्फ़ पाँव में कुल की लाज सीमाओं का...
Abstract Painting of a woman, person from Sushila Takbhore book cover

गाली

वफ़ा के नाम पर अपने आप को एक कुत्ता कहा जा सकता है, मगर कुतिया नहीं। कुतिया शब्द सुनकर ही लगता है यह एक गाली है। क्या इसलिए कि वह स्त्री है उसका...
Sheoraj Singh Bechain

टैगोर

'Tagore', a poem by Sheoraj Singh Bechain कबीर की सौ कविताएँ रैदास के शब्दों का सारा ज्ञान संगीत की साधना गीतांजलि का अद्भुत अवदान सब एक ओर सब बेमतलब यदि मानव को अछूत करने...
Namdeo Dhasal

माँ

अनुवाद : निशिकांत ठकार दुःख इस बात का नहीं है कि माँ चल बसी हर किसी की माँ कभी न कभी मर जाती है दुःख इस बात...
Manikarnika

मणिकर्णिका – डॉ. तुलसीराम

डॉ. तुलसीराम की आत्मकथा (दूसरा खण्ड) 'मणिकर्णिका' से किताब अंश | Book Excerpt from 'Manikarnika' by Dr. Tulsiram मैं उस मकान में लगभग डेढ़ साल...
Stree Hawker, Vendor, Woman

कवच

'Kawach', a story by Urmila Pawar अनुवाद: कौशल्या बैसंत्री सवेरे, अँधेरे में उठते ही इन्दिरा का मुँह चूड़ियों की तरह बजने लगा। रुक-रुककर वह गौन्या को...

मेरी प्रिय कविता

'Meri Priya Kavita', a poem by Namdeo Dhasal मराठी से अनुवाद: सूर्यनारायण रणसुभे मुझे नहीं बसाना है अलग से स्वतन्त्र द्वीप मेरी प्रिय कविता, तू चलती रह सामान्य...
Om Prakash Valmiki

अँधेरे में शब्द

'Andhere Mein Shabd', a poem by Om Prakash Valmiki रात गहरी और काली है अकालग्रस्त त्रासदी जैसी जहाँ हज़ारों शब्द दफ़न हैं इतने गहरे कि उनकी सिसकियाँ भी सुनायी नहीं देतीं समय के...

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Women at beach

मन का घर, तुमसे विलग होकर

मन का घर उसके मन के घर में गूँजती रहती हैं टूटती इच्छाओं की मौन आवाज़ें उसमें हर बालिश्त दर्ज होती जाती है छूटते जा रहे सपनों से पलायन की एक लम्बी...
Bashar Nawaz

वक़्त के कटहरे में

सुनो तुम्हारा जुर्म तुम्हारी कमज़ोरी है अपने जुर्म पे रंग-बिरंगे लफ़्ज़ों की बेजान रिदाएँ मत डालो सुनो तुम्हारे ख़्वाब तुम्हारा जुर्म नहीं हैं तुम ख़्वाबों की ताबीर से...
Giriraj Kishore

नायक

'रिश्ता और अन्य कहानियाँ' से आँगन में वह बाँस की कुर्सी पर पाँव उठाए बैठा था। अगर कुर्ता-पाजामा न पहने होता तो सामने से आदिम...
Love, Couple

नीरव की कविताएँ

1 ढहते थे पेड़ रोती थी पृथ्वी हँसता था आदमी मरती थी नदी बिलखता था आकाश हँसता था आदमी टूटता था संगीत बुझता था प्रकाश हँसता था आदमी टूट रहा है आदमी बुझ रहा है...
Dilawar Figar

दावतों में शाइरी

दावतों में शाइरी अब हो गई है रस्म-ए-आम यूँ भी शाइर से लिया जाता है अक्सर इंतिक़ाम पहले खाना उसको खिलवाते हैं भूखे की तरह फिर उसे करते...
Bharat Bhushan

मन, कितना अभिनय शेष रहा?

मन, कितना अभिनय शेष रहा? सारा जीवन जी लिया, ठीक जैसा तेरा आदेश रहा! बेटा, पति, पिता, पितामह सब इस मिट्टी के उपनाम रहे, जितने सूरज उगते देखो उससे ज़्यादा संग्राम...
Mohammad Alvi

मैं और तू

ख़ुदा-वंद... मुझ में कहाँ हौसला है कि मैं तुझसे नज़रें मिलाऊँ तिरी शान में कुछ कहूँ तुझे अपनी नज़रों से नीचे गिराऊँ ख़ुदा-वंद... मुझ में कहाँ हौसला है कि...
Vishnu Khare

अकेला आदमी

अकेला आदमी लौटता है बहुत रात गए या शायद पूरी रात बाद भी घर के ख़ालीपन को स्मृतियों के गुच्छे से खोलता हुआ अगर वे लोग...
Ambar Bahraichi

जगमगाती रौशनी के पार क्या था देखते

जगमगाती रौशनी के पार क्या था देखते धूल का तूफ़ाँ अंधेरे बो रहा था देखते सब्ज़ टहनी पर मगन थी फ़ाख़्ता गाती हुई एक शकरा पास ही...
Malkhan Singh

मुझे ग़ुस्सा आता है

मेरा माँ मैला कमाती थी बाप बेगार करता था और मैं मेहनताने में मिली जूठन को इकट्ठा करता था, खाता था। आज बदलाव इतना आया है कि जोरू मैला...
Bulbbul - a comment

सीता और काली की बाइनरी से अछूती नहीं है ‘बुलबुल’

मनोरंजन के 'तीसरे' परदे के रूप में उभरे नेटफ़्लिक्स पर आयी फ़िल्म 'बुलबुल' इन दिनों ख़ूब चर्चा में है। चर्चा का मुख्य विषय है...
Silent, Silence

इतिहास की कालहीन कसौटी

बन्‍द अगर होगा मन आग बन जाएगा, रोका हुआ हर शब्‍द चिराग़ बन जाएगा। सत्ता के मन में जब-जब पाप भर जाएगा झूठ और सच का सब अन्‍तर मिट जाएगा न्‍याय...
Waiting, Train, Girl, Window, Thinking, Alone, Lonely

बेटिकट

एक ट्रेन का सपना देखता हूँ मैं जो अतीत के किसी स्टेशन से छूटती है और बेतहाशा चलती चली जाती है समय की किसी अज्ञात दिशा में मैं सवार...
Javed Akhtar

मेले

बाप की उँगली थामे इक नन्हा-सा बच्चा पहले-पहल मेले में गया तो अपनी भोली-भाली कंचों जैसी आँखों से इक दुनिया देखी ये क्या है और वो क्या है सब उसने पूछा बाप...
Writing

समकालीन युवा लेखन पर कुछ विचार

जब भी कोई अनुभवी लेखक किसी युवा को सम्भावनाशील लेखक या कवि कहता है, वह यही बता रहा होता है कि आप एक रास्ते...
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ख़्वाबों के ब्योपारी

हम ख़्वाबों के ब्योपारी थे पर इसमें हुआ नुक़सान बड़ा कुछ बख़्त में ढेरों कालक थी कुछ अब के ग़ज़ब का काल पड़ा हम राख लिए हैं झोली...
Agyeya

यूरोप की छत पर : स्विट्ज़रलैण्ड

दुनिया की नहीं तो यूरोप की छत : अपने पर्वतीय प्रदेश के कारण स्विटजरलैण्ड को प्रायः यह नाम दिया जाता था—किन्तु हिमालय को घर...
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बीस साल बाद मेरे चेहरे में वे आँखें लौट आयी हैं जिनसे मैंने पहली बार जंगल देखा है: हरे रंग का एक ठोस सैलाब जिसमें सभी पेड़...
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Short Story: 'Araby' Writer: James Joyce अनुवाद: उपमा ऋचा लेखक परिचय: आयरलैण्ड के रचनाकार जेम्स जॉयस (1882-1941) ने सिर्फ़ कहानियाँ ही नहीं लिखीं, उपन्यास भी लिखे और साहित्य...
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शरीफ़ लोग

पत्थर के कोयले से जो धुआँ उठता है उसमें एक शहर महकता है सुना है उस शहर में शरीफ़ लोग रहते हैं लेकिन शराफ़त का धुएँ से क्या नाता है यह समझ...
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