Tag: जाति

Dwarka Bharti

द्वारका भारती की कविताएँ

द्वारका भारती पंजाबी भाषा के सुपरिचित कवि, लेखक व उपन्यासकार हैं और पिछले कई सालों से पंजाबी दलित साहित्य आन्दोलन का नेतृत्व कर रहे...
Rahul Sankrityayan

तुम्हारी जात-पाँत की क्षय

हमारे देश को जिन बातों पर अभिमान है, उनमें जात-पाँत भी एक है। दूसरे मुल्कों में जात-पाँत का भेद समझा जाता है भाषा के...
Pooja Shah

पूजा शाह की कविताएँ

पाज़ेब पाज़ेब पाँवों में नहीं स्तनों पर पहनने से सार्थक होंगीजब औरतें क़दम रखती हैं पकौड़ियों की थाली लिए आदमियों से भरे कमरे में उनकी गपशप के बीचया जब...
Tamboora

गाँव की खूँटी पर

मेरे गाँव के धनाराम मेघवाल को जिस उम्र में जाना चाहिए था स्कूल करने चाहिए थे बाबा साहब के सपने पूरे उस उम्र में उसने की थी...
Murdahiya - Tulsiram

किताब अंश: ‘मुर्दहिया’ – डॉ॰ तुलसीराम

मुर्दहिया दलित साहित्यकार डॉ॰ तुलसीराम की आत्मकथा है। 'मुर्दहिया' अनूठी साहित्यिक कृति होने के साथ ही पूर्वी उत्तर प्रदेश के दलितों की जीवन स्थितियों तथा इस क्षेत्र...
Om Prakash Valmiki

युग-चेतना

मैंने दुःख झेले सहे कष्‍ट पीढ़ी-दर-पीढ़ी इतने फिर भी देख नहीं पाए तुम मेरे उत्‍पीड़न को इसलिए युग समूचा लगता है पाखण्डी मुझको।इतिहास यहाँ नक़ली है मर्यादाएँ सब झूठी हत्‍यारों की रक्‍तरंजित...
Namdeo Dhasal

गुलाबी अयाल का घोड़ा

मुझे स्वतंत्रता पसन्द है वह बढ़िया होती है समुद्र-जैसीघोड़ा आओ, उसका परिचय कर लेंगे शतकों की सूलि पर चढ़ते हुऐ उसने देखा है हमें अपना सबकुछ शुरू होता है...
Rajni Tilak

वजूद है

आज जब अख़बार देते हैं ख़बरें हमारी अस्मिता लुट जाने की बर्बरता और घिनौनी चश्मदीद घटनाओं की ख़ून खौल क्यूँ नहीं उठता हमारा? सफ़ेदपोशी में ढँकते-ढाँपते हम मुर्दा ही हो...
Ramnika Gupta

गधे का सर

हाथों का हाथी हूँ पाँव का घोड़ा सर पर धर दिया है तुमने घोड़े जैसा सब्र के गधे का सर कोल्हू के बैल की तरह आँखों पर बाँध दिया तुमने चमड़े...
Adam Gondvi

मैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आपको

आइए महसूस करिए ज़िन्दगी के ताप को मैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आपकोजिस गली में भुखमरी की यातना से ऊबकर मर गई फुलिया बिचारी एक...
Abstract, Love, Couple

पुनरावर्तन

कहीं कोई पत्ता भी नहीं खड़केगा हर बार की तरह ऐसे ही सुलगते पलाश रक्त की चादर ओढ़े चीलों और गिद्धों को खींच ले आएँगेघेरकर मारे जाने...
Om Prakash Valmiki

सदियों का संताप

दोस्‍तो! बिता दिए हमने हज़ारों वर्ष इस इंतज़ार में कि भयानक त्रासदी का युग अधबनी इमारत के मलबे में दबा दिया जाएगा किसी दिन ज़हरीले पंजों समेतफिर हम सब एक जगह...

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Upma Richa

या देवी

1सृष्टि की अतल आँखों में फिर उतरा है शक्ति का अनंत राग धूम्र गंध के आवक स्वप्न रचती फिर लौट आयी है देवी रंग और ध्वनि का निरंजन...
Chen Kun Lun

चेन कुन लुन की कविताएँ

चेन कुन लुन का जन्म दक्षिणी ताइवान के काओशोंग शहर में सन 1952 में हुआ। वह एक सुधी सम्पादक रहे हैं। चेन लिटरेरी ताइवान...
Bharat Ke Pradhanmantri - Rasheed Kidwai

किताब अंश: भारत के प्रधानमंत्री

सुपरिचित पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक रशीद किदवई की किताब 'भारत के प्रधानमंत्री : देश, दशा, दिशा' भारत के पहले प्रधानमंत्री से लेकर वर्तमान प्रधानमंत्री...
Muktibodh - Premchand

मेरी माँ ने मुझे प्रेमचन्द का भक्त बनाया

एक छाया-चित्र है। प्रेमचन्द और प्रसाद दोनों खड़े हैं। प्रसाद गम्भीर सस्मित। प्रेमचन्द के होंठों पर अस्फुट हास्य। विभिन्न विचित्र प्रकृति के दो धुरन्धर...
Manish Kumar Yadav

लगभग विशेषण हो चुका शासक

किसी अटपटी भाषा में दिए जा रहे हैं हत्याओं के लिए तर्क'एक अहिंसा है जिसका सिक्का लिए गांधीजी हर शहर में खड़े हैं लेकिन जब भी सिक्का उछालते...
Village, Farmer

किसान को कौन जानता है?

हवा को जितना जानता है पानी कोई नहीं जानतापानी को जितना जानती है आग कोई नहीं जानताआग को जितना जानते हैं पेड़ कोई नहीं जानतापेड़ को जितना...
premchand

सवा सेर गेहूँ

किसी गाँव में शंकर नाम का एक कुरमी किसान रहता था। सीधा-सादा ग़रीब आदमी था, अपने काम-से-काम, न किसी के लेने में, न किसी...
Unsocial Network - Dilip Mandal, Geeta Yadav

वे आपके बारे में बहुत ज़्यादा जानते हैं (किताब अंश: अनसोशल नेटवर्क)

'अनसोशल नेटवर्क' किताब भारत के विशिष्ट सन्दर्भों में सोशल मीडिया का सम्यक् आकलन प्रस्तुत करती है। जनसंचार का नया माध्यम होने के बावजूद, सोशल...
Prayers, Joined Hands

अनुत्तरित प्रार्थना

'परिवर्तन प्रकृति का नियम है' यह पढ़ते-पढ़ाते वक़्त मैंने पूरी शिद्दत के साथ अपने रिश्तों में की स्थिरता की कामनाप्रकृति हर असहज कार्य भी पूरी सहजता के...
Women sitting

अठन्नी, चवन्नी और क्रमशः

इस बार उन्हें नहीं था मोह स्वर्ण-मृग का फिर भी खींची गई थीं लक्ष्मण रेखाएँवे पढ़ीं, आगे बढ़ीं लक्ष्मण रेखाएँ लाँघकर रावण से जा भिड़ींगूँजते आए थे स्वर नेपथ्य...
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