Tag: दलित विमर्श

Asangghosh

‘अब मैं साँस ले रहा हूँ’ से कविताएँ

'अब मैं साँस ले रहा हूँ' से कविताएँ स्वानुभूति मैं लिखता हूँ आपबीती पर कविता जिसे पढ़ते ही तुम तपाक से कह देते हो कि कविता में कल्पनाओं को कवि ने...
Suresh Jinagal

सुरेश जिनागल की कविताएँ: अक्टूबर 2020

ललेश्वरी बर्फ़ का सीना चीरकर उगे चिनार के नीचे बैठकर आग का कोई गीत गाती स्त्री सदियों की बर्फ़ को पिघला रही है उसकी ज़िद, उसका साहस...
Sushila Takbhore

खोज की बुनियाद

यह रहस्य तो नहीं खोज की बुनियाद है आज फिर मैं उड़ने लगी हूँ बे-पर बंजर ज़मीन पर फूटे हैं अंकुर आस की दूब चरने लगा है मन का मिरग किस दिशा से बांधोगे तुम इसे काल का...
Thumb, Revolution, History, Red, Blood

इतिहास

वक़्त की रेशमी रस्सी मेरे हाथ से फिसल रही थी इतिहास का घोड़ा उसे विपरीत दिशा में खींच रहा था तुम्हें यह कितना बड़ा मज़ाक़ लगता था जब मैं उसे अपनी तरफ़ खींचता था रस्सी...
Jaiprakash Leelwan

क्या-क्या मारोगे?

उम्मीदों सपनों पत्थरों लोगों फूलों तितलियों तारों को मारोगे? मरीज़ों दवाओं स्त्रियों दलितों मछलियों झीलों समुन्दरों को मारोगे? हिरणों मेमनों मौसमों जंगलों पर्वतों नदियों पुलों को मारोगे? पलों दिनों हफ़्तों महीनों सालों युगों सदियों को मारोगे? शब्दों अक्षरों वर्णों स्वरों शैलियों भाषाओं व्याकरणों को मारोगे? रातों साँसों चुम्बनों उमंगों ख़्वाबों भावनाओं विचारों कविताओं को मारोगे? बच्चों रोटियों घरों माँओं बहिनों भाइयों साथियों को मारोगे? किताबों कार्यों कोंपलों कोमलताओं कौमार्य कमेरों क्रान्ति को मारोगे? समय समता सरोकार सवालों सन्ध्या सुबह साहित्य को मारोगे? जन्म जंगल ज़ुबान जीभ ज़मीन जनता जनतन्त्र को मारोगे? आज आज़ादी अधिकार अदब आदमी आन्दोलन आम्बेडकरों को मारोगे? मन्तव्यों मक़सदों मतलबों मनुष्यों मुद्दों मसलों मंज़िलों को...
Sharankumar Limbale

दलित-लेखक ज़िन्दगी-भर झोंपड़ी में ही रहें, यह कैसा दुराग्रह?

शरणकुमार लिम्बाले की आत्मकथा 'अक्करमाशी' से 'दलित-आत्मकथा' एक बहुचर्चित साहित्य-विधा है। दलित-कविता तथा समीक्षा के कारण दलित-साहित्य का विकास हुआ, तो दलित-आत्मकथा के कारण यह...
Joseph Macwan

रोटले को नज़र लग गई

सुबह के कामों से फ़ारिग होते ही उसका पहला काम होता रोटला बनाना। वह हर रोज़ गिनकर चार रोटला बनाती; बाजरी के आटे में...
Malkhan Singh

मैं आदमी नहीं हूँ

1 मैं आदमी नहीं हूँ स्साब जानवर हूँ दोपाया जानवर जिसे बात-बात पर मनुपुत्र—माँ चो, बहन चो, कमीन क़ौम कहता है। पूरा दिन बैल की तरह जोतता है मुट्ठी-भर सत्तू मजूरी में देता है। मुँह...
Farmer, Field, Village

भयानक है छल : भाग-1

धूप तेज़ होने लगी थी आसमान में तैरने लगा हल्का-सा एक बादल सुदूर जंगल से घर लौटते हुए लकड़ी का गठ्ठर सिर पर उठाए तातप्पा के भीतर गहराता जा रही है अपनी...
Malkhan Singh

मुझे ग़ुस्सा आता है

मेरा माँ मैला कमाती थी बाप बेगार करता था और मैं मेहनताने में मिली जूठन को इकट्ठा करता था, खाता था। आज बदलाव इतना आया है कि जोरू मैला...
Om Prakash Valmiki

तब तुम क्या करोगे?

यदि तुम्हें धकेलकर गाँव से बाहर कर दिया जाए पानी तक न लेने दिया जाए कुएँ से दुत्कारा-फटकारा जाए चिलचिलाती दोपहर में कहा जाए तोड़ने को पत्थर काम के बदले दिया जाए खाने...
Tribe, Village, Adivasi, Labour, Tribal, Poor

समानान्तर इतिहास

इतिहास राजपथ का होता है पगडण्डियों का नहीं! सभ्यताएँ बनती हैं इतिहास और सभ्य इतिहास पुरुष! समय उन बेनाम क़दमों का क़ायल नहीं जो अनजान दर्रों जंगलों कछारों पर पगडण्डियों की आदिम लिपि— रचते हैं ये कीचड़-सने कंकड़-पत्थर...

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Recent Posts

Balli Singh Cheema

रोटी माँग रहे लोगों से

रोटी माँग रहे लोगों से किसको ख़तरा होता है? यार सुना है लाठी-चारज, हल्का-हल्का होता है। सिर फोड़ें या टाँगें तोड़ें, ये क़ानून के रखवाले, देख रहे हैं...
Sushant Supriye - Daldal

क़िस्सागोई का कौतुक देती कहानियाँ

समीक्ष्य कृति: दलदल (कहानी संग्रह) (अंतिका प्रकाशन, ग़ाज़ियाबाद) टिप्पणी: सुषमा मुनीन्द्र 1 सुपरिचित रचनाकार सुशांत सुप्रिय का सद्यः प्रकाशित कथा संग्रह ‘दलदल’ ऐसे समय में आया है...
Naked Lady, Crouching Nude, Woman

कविताएँ: दिसम्बर 2020

लड़कियों का मन कसैला हो गया है इन दिनों लड़कियों का मन कसैला हो गया है अब वह हँसती नहीं दुपट्टा भी लहराती नहीं अब झूला झूलती नहीं न ही...
Man sitting seaside, Beach, Water

मेरे देखने से, प्रेम में असफल लड़के पर कविता

मेरे देखने से मैंने देखा तो नीला हो गया आकाश, झूमने लगे पीपल के चमकते हरे पत्ते। मैंने देखा तो सफ़ेद बर्फ़ से ढँका भव्य पहाड़ एकदम से उग आया क्षितिज पर। मैंने...
Fight, Oppression, Beating

कायरों का गीत

शोर करोगे! मारेंगे बात कहोगे! मारेंगे सच बोलोगे! मारेंगे साथ चलोगे! मारेंगे ये जंगल तानाशाहों का इसमें तुम आवाज़ करोगे? मारेंगे... जो जैसा चलता जाता है, चलने दो दीन-धरम के नाम...
Dictatorship

क्या तानाशाह जानते हैं

क्या तानाशाह जानते हैं कि मुसोलिनी के ज़हर उगलने वाले मुँह में डाला गया था मरा हुआ चूहा एक औरत ने सरेआम स्कर्ट उठाकर मूत दिया था मुसोलिनी के मुँह पर लटकाया...
Shrikant Verma

सूर्य के लिए

गहरे अँधेरे में, मद्धिम आलोक का वृत्त खींचती हुई बैठी हो तुम! चूल्हे की राख-से सपने सब शेष हुए। बच्चों की सिसकियाँ भीतों पर चढ़ती छिपकलियों सी बिछल गईं। बाज़ारों के सौदे जैसे जीवन के...
Ashok Vajpeyi

हाथ

1 यह सुख भी असह्य हो जाएगा यह पूरे संसार का जैसे एक फूल में सिमटकर हाथ में आ जाना यह एक तिनके का उड़ना घोंसले का सपना बनकर आकाश में यह...
Viren Dangwal

कैसी ज़िन्दगी जिए

एक दिन चलते-चलते यों ही ढुलक जाएगी गर्दन सबसे ज़्यादा दुःख सिर्फ़ चश्मे को होगा, खो जाएगा उसका चेहरा अपनी कमानियों से ब्रह्माण्ड को जैसे-तैसे थामे वह भी चिपटा रहेगा...
Periyar Books in Hindi

पेरियारः प्रेरणा और प्रयोजन

पेरियारः प्रेरणा और प्रयोजन कृपाशंकर चौबे बहुजन साहित्य की अवधारणा को सैद्धान्तिक आधार देनेवाले प्रमोद रंजन ने समाज सुधार आन्दोलन के पितामह पेरियार ई.वी. रामासामी (17...
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