Tag: दलित विमर्श

Woman Feet

घर की चौखट से बाहर

दरवाज़े के पीछे परदे की ओट से झाँकती औरत दरवाज़े से बाहर देखती है- गली-मोहल्ला, शहर, संसार! आँख, कान, विचार स्वतन्त्र हैं बन्धन हैं सिर्फ़ पाँव में कुल की लाज सीमाओं का...
Abstract Painting of a woman, person from Sushila Takbhore book cover

गाली

वफ़ा के नाम पर अपने आप को एक कुत्ता कहा जा सकता है, मगर कुतिया नहीं। कुतिया शब्द सुनकर ही लगता है यह एक गाली है। क्या इसलिए कि वह स्त्री है उसका...
Sheoraj Singh Bechain

टैगोर

'Tagore', a poem by Sheoraj Singh Bechain कबीर की सौ कविताएँ रैदास के शब्दों का सारा ज्ञान संगीत की साधना गीतांजलि का अद्भुत अवदान सब एक ओर सब बेमतलब यदि मानव को अछूत करने...
Namdeo Dhasal

माँ

अनुवाद : निशिकांत ठकार दुःख इस बात का नहीं है कि माँ चल बसी हर किसी की माँ कभी न कभी मर जाती है दुःख इस बात...
Manikarnika

मणिकर्णिका – डॉ. तुलसीराम

डॉ. तुलसीराम की आत्मकथा (दूसरा खण्ड) 'मणिकर्णिका' से किताब अंश | Book Excerpt from 'Manikarnika' by Dr. Tulsiram मैं उस मकान में लगभग डेढ़ साल...
Stree Hawker, Vendor, Woman

कवच

'Kawach', a story by Urmila Pawar अनुवाद: कौशल्या बैसंत्री सवेरे, अँधेरे में उठते ही इन्दिरा का मुँह चूड़ियों की तरह बजने लगा। रुक-रुककर वह गौन्या को...

मेरी प्रिय कविता

'Meri Priya Kavita', a poem by Namdeo Dhasal मराठी से अनुवाद: सूर्यनारायण रणसुभे मुझे नहीं बसाना है अलग से स्वतन्त्र द्वीप मेरी प्रिय कविता, तू चलती रह सामान्य...
Om Prakash Valmiki

अँधेरे में शब्द

'Andhere Mein Shabd', a poem by Om Prakash Valmiki रात गहरी और काली है अकालग्रस्त त्रासदी जैसी जहाँ हज़ारों शब्द दफ़न हैं इतने गहरे कि उनकी सिसकियाँ भी सुनायी नहीं देतीं समय के...
Om Prakash Valmiki

कोई ख़तरा नहीं

'Koi Khatra Nahi', a poem by Omprakash Valmiki शहर की सड़कों पर दौड़ती-भागती गाड़ियों के शोर में सुनायी नहीं पड़तीं सिसकियाँ बोझ से दबे आदमी की जो हर बार फँस...

परती ज़मीन

'Parti Zameen', a story by Boya Jangaiah अनुवाद - डॉ. सना छह-सात सौ घरों के उस गाँव में ज़्यादातर लोगों की ज़िन्दगी मेहनत-मज़दूरी पर निर्भर है।...
Arjun Dangle

बुद्ध ही मरा पड़ा है

अनुवाद: शिवदत्ता वावळकर वह सम्पत को बैठक से बाहर लाया। बैठक में थोड़ी-सी हलचल मची। साँस छोड़कर वह सम्पत के कान में बोला, "तुम्हें क्या लगता...
Baburao Bagul

जब मैंने जाति छुपाई

"महार होने से क्या हुआ? दीवार के सामने पड़ी टट्टी-पेशाब की गन्दगी साफ़ नहीं करूँगा।" "तुम्हें करनी होगी और बराबर साफ़ करनी होगी।"

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Suresh Jinagal

सुरेश जिनागल की कविताएँ: अक्टूबर 2020

ललेश्वरी बर्फ़ का सीना चीरकर उगे चिनार के नीचे बैठकर आग का कोई गीत गाती स्त्री सदियों की बर्फ़ को पिघला रही है उसकी ज़िद, उसका साहस...
Ganesh Shankar Vidyarthi

धर्म की आड़

इस समय, देश में धर्म की धूम है। उत्‍पात किये जाते हैं, तो धर्म और ईमान के नाम पर और ज़िद की जाती है,...
Ibne Insha

सब माया है

सब माया है, सब ढलती-फिरती छाया है इस इश्क़ में हमने जो खोया, जो पाया है जो तुमने कहा है, 'फ़ैज़' ने जो फ़रमाया है सब माया...
Sandeep Nirbhay

चिलम में चिंगारी और चरखे पर सूत

मेरे बच्चो! अपना ख़याल रखना आधुनिकता की कुल्हाड़ी काट न दे तुम्हारी जड़ें जैसे मोबाइलों ने लोक-कथाओं और बातों के पीछे लगने वाले हँकारों को काट दिया है जड़ों सहित वर्तमान...
Kunwar Narayan

अबकी अगर लौटा तो

अबकी अगर लौटा तो बृहत्तर लौटूँगा चेहरे पर लगाए नोकदार मूँछें नहीं कमर में बाँधे लोहे की पूँछें नहीं जगह दूँगा साथ चल रहे लोगों को तरेरकर न देखूँगा...
Poonachi - Perumal Murugan

पेरुमल मुरुगन – ‘पूनाची’

पेरुमल मुरुगन के उपन्यास 'पूनाची' से उद्धरण | Quotes by Perumal Murugan from 'Poonachi'   "मैं इंसानों के बारे में लिखने के प्रति आशंकित रहता हूँ;...
Leeladhar Jagudi

अपने अन्दर से बाहर आ जाओ

हर चीज़ यहाँ किसी न किसी के अन्दर है हर भीतर जैसे बाहर के अन्दर है फैलकर भी सारा का सारा बाहर ब्रह्माण्ड के अन्दर है बाहर सुन्दर...
Dhoomil

पटकथा

जब मैं बाहर आया मेरे हाथों में एक कविता थी और दिमाग़ में आँतों का एक्स-रे। वह काला धब्बा कल तक एक शब्द था; ख़ून के अँधेर में दवा का ट्रेडमार्क बन गया...
Venu Gopal

मेरा वर्तमान

मैं फूल नहीं हो सका। बग़ीचों से घिरे रहने के बावजूद। उनकी हक़ीक़त जान लेने के बाद यह मुमकिन भी नहीं था। यों अनगिन फूल हैं वहाँ। लेकिन मुस्कुराता हुआ...
Kedarnath Agarwal

हमारी ज़िन्दगी

हमारी ज़िन्दगी के दिन, बड़े संघर्ष के दिन हैं। हमेशा काम करते हैं, मगर कम दाम मिलते हैं। प्रतिक्षण हम बुरे शासन, बुरे शोषण से पिसते हैं। अपढ़, अज्ञान, अधिकारों से वंचित...
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