Tag: दलित साहित्य

Om Prakash Valmiki

शम्बूक का कटा सिर

जब भी मैंने किसी घने वृक्ष की छाँव में बैठकर घड़ी भर सुस्‍ता लेना चाहा, मेरे कानों में भयानक चीत्‍कारें गूँजने लगीं जैसे हर एक टहनी पर लटकी हो लाखों...
Woman Feet

घर की चौखट से बाहर

दरवाज़े के पीछे परदे की ओट से झाँकती औरत दरवाज़े से बाहर देखती है- गली-मोहल्ला, शहर, संसार! आँख, कान, विचार स्वतन्त्र हैं बन्धन हैं सिर्फ़ पाँव में कुल की लाज सीमाओं का...
Abstract Painting of a woman, person from Sushila Takbhore book cover

गाली

'Gaali', a poem by Sushila Takbhore वफ़ा के नाम पर अपने आप को एक कुत्ता कहा जा सकता है, मगर कुतिया नहीं। कुतिया शब्द सुनकर ही लगता है यह एक गाली है। क्या...
Sheoraj Singh Bechain

टैगोर

'Tagore', a poem by Sheoraj Singh Bechain कबीर की सौ कविताएँ रैदास के शब्दों का सारा ज्ञान संगीत की साधना गीतांजलि का अद्भुत अवदान सब एक ओर सब बेमतलब यदि मानव को अछूत करने...
Namdeo Dhasal

माँ

'Maa', a poem by Namdeo Dhasal अनुवाद : निशिकांत ठकार दुःख इस बात का नहीं है कि माँ चल बसी हर किसी की माँ कभी न कभी...
Manikarnika

मणिकर्णिका – डॉ. तुलसीराम

डॉ. तुलसीराम की आत्मकथा (दूसरा खण्ड) 'मणिकर्णिका' से किताब अंश | Book Excerpt from 'Manikarnika' by Dr. Tulsiram मैं उस मकान में लगभग डेढ़ साल...
Stree Hawker, Vendor, Woman

कवच

'Kawach', a story by Urmila Pawar अनुवाद: कौशल्या बैसंत्री सवेरे, अँधेरे में उठते ही इन्दिरा का मुँह चूड़ियों की तरह बजने लगा। रुक-रुककर वह गौन्या को...

मेरी प्रिय कविता

'Meri Priya Kavita', a poem by Namdeo Dhasal मराठी से अनुवाद: सूर्यनारायण रणसुभे मुझे नहीं बसाना है अलग से स्वतन्त्र द्वीप मेरी प्रिय कविता, तू चलती रह सामान्य...
Om Prakash Valmiki

अँधेरे में शब्द

'Andhere Mein Shabd', a poem by Om Prakash Valmiki रात गहरी और काली है अकालग्रस्त त्रासदी जैसी जहाँ हज़ारों शब्द दफ़न हैं इतने गहरे कि उनकी सिसकियाँ भी सुनायी नहीं देतीं समय के...
Om Prakash Valmiki

कोई ख़तरा नहीं

'Koi Khatra Nahi', a poem by Omprakash Valmiki शहर की सड़कों पर दौड़ती-भागती गाड़ियों के शोर में सुनायी नहीं पड़तीं सिसकियाँ बोझ से दबे आदमी की जो हर बार फँस...

परती ज़मीन

'Parti Zameen', a story by Boya Jangaiah अनुवाद - डॉ. सना छह-सात सौ घरों के उस गाँव में ज़्यादातर लोगों की ज़िन्दगी मेहनत-मज़दूरी पर निर्भर है।...
Arjun Dangle

बुद्ध ही मरा पड़ा है

अनुवाद: शिवदत्ता वावळकर वह सम्पत को बैठक से बाहर लाया। बैठक में थोड़ी-सी हलचल मची। साँस छोड़कर वह सम्पत के कान में बोला, "तुम्हें क्या लगता...

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