Tag: Democracy

Sandeep Nirbhay

चिलम में चिंगारी और चरखे पर सूत

मेरे बच्चो! अपना ख़याल रखना आधुनिकता की कुल्हाड़ी काट न दे तुम्हारी जड़ें जैसे मोबाइलों ने लोक-कथाओं और बातों के पीछे लगने वाले हँकारों को काट दिया है जड़ों सहित वर्तमान...
Sarveshwar Dayal Saxena

देश काग़ज़ पर बना नक़्शा नहीं होता

यदि तुम्हारे घर के एक कमरे में आग लगी हो तो क्या तुम दूसरे कमरे में सो सकते हो? यदि तुम्हारे घर के एक कमरे में लाशें सड़ रही...
Adam Gondvi

तुम्हारी फ़ाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है

तुम्हारी फ़ाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है मगर ये आँकड़ें झूठे हैं, ये दावा किताबी है उधर जम्हूरियत का ढोल पीटे जा रहे हैं वो इधर...
Posham Pa

मदारी का लोकतन्त्र

वो किसी धूर्त मदारी की तरह वादों की डुगडुगी बजाते हुए पीटते हैं ताली, टटोलते हैं हमारी जेबें, तोड़ते हैं आज़ाद क़लमें, जाँचते हैं हमारे शब्द, सूँघते हैं हमारी थालियाँ, बाँटते हैं हमारे त्यौहार, बदल देते हैं इतिहास की किताब, गिनते हैं...
Woman, Vote, Democracy

सुनो दारोग़ा

सुनो दारोग़ा, मैं एक गुमशुदा की रपट लिखाना चाहता हूँ— नाम? लोकतंत्र। पूरा नाम? रोटी, कपड़ा और मकान। रंग? गहरा लाल ख़ून। पता? हाकिम की रैली। कब से लापता है? सन् सैतालिस की रात से। किसी पर...
Madan Daga

क्षणिकाएँ : मदन डागा

कुर्सी कुर्सी पहले कुर्सी थी फ़क़त कुर्सी, फिर सीढ़ी बनी और अब हो गई है पालना, ज़रा होश से सम्भालना! भूख से नहीं मरते हमारे देश में आधे से अधिक लोग ग़रीबी की रेखा के...
Paritosh Kumar Piyush

नया शब्दकोश

कुछ तो है भीतर बेरंग बादल-सा उमड़ता, घुमड़ता, गहराता, डराता मैं ख़ुद की दहशत में हूँ बेहद शान्त, भयभीत जैसे कोई हारा हुआ खिलाड़ी जैसे कोई ट्रेन से छूटा हुआ...
Gaurav Bharti

गौरव भारती की कविताएँ

कील एक साल तीन सौ पैंसठ दिन पूरे आठ हज़ार सात सौ साठ घण्टे एक कील के सहारे दीवार पर टंगे हुए हैं मेरे साथियों आओ, मुझे तपाओ आग की भट्ठी में...
Kedarnath Agarwal

ज़िन्दगी

देश की छाती दरकते देखता हूँ! थान खद्दर के लपेटे स्वार्थियों को, पेट-पूजा की कमाई में जुता मैं देखता हूँ! सत्य के जारज सुतों को, लंदनी गौरांग प्रभु...
B R Ambedkar

‘प्रजातंत्र का अर्थ मात्र चुनाव कराना नहीं है’

बाबासाहेब डॉ. भीमराव आम्बेडकर की किताब 'हिन्दू धर्म की रिडल' से किताब अंश | Book Excerpt from 'Riddles in Hinduism', a book by Babasaheb...
War, Blood, Mob, Riots

भीड़

'Bheed', a poem by Adarsh Bhushan भीड़ ने सिर्फ़ भिड़ना सीखा है, दस्तक तो सवाल देते हैं भूखी जून के अंधे बस्त के टूटे विश्वास के लंगड़े तंत्र के लाइलाज स्वप्न के- कि इस बार चुनाव...
Fist, Protest, Dissent

अंकित कुमार भगत की कविताएँ

Poems: Ankit Kumar Bhagat प्रतिरोध काले गुलाब और स्याह परछाइयों के बाद, कालिख पुती दीवारें इस दौर की विशेषताएँ हैं। अँधेरा गहराता ही जाता है, कि असहमतियों को आज़माने की इजाज़त नहीं यहाँ। विद्रोह...

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Recent Posts

Naveen Sagar

बचते-बचते थक गया

दिन-रात लोग मारे जाते हैं दिन-रात बचता हूँ बचते-बचते थक गया हूँ न मार सकता हूँ न किसी लिए भी मर सकता हूँ विकल्‍प नहीं हूँ दौर का कचरा हूँ हत्‍या...
Paash

आधी रात में

आधी रात में मेरी कँपकँपी सात रज़ाइयों में भी न रुकी सतलुज मेरे बिस्तर पर उतर आया सातों रज़ाइयाँ गीली बुख़ार एक सौ छह, एक सौ सात हर साँस पसीना-पसीना युग...
Giving Flower, Love, Joy, Happiness, Flower

सुन्दर बातें

जब हम मिले थे वह समय भी अजीब था शहर में दंगा था कोई कहीं आ-जा नहीं सकता था एक-दूसरे को वर्षों से जानने वाले लोग एक-दूसरे को अब...
Kedarnath Agarwal

प्रश्न

मोड़ोगे मन या सावन के घन मोड़ोगे? मोड़ोगे तन या शासन के फन मोड़ोगे? बोलो साथी! क्या मोड़ोगे? तोड़ोगे तृण या धीरज धारण तोड़ोगे? तोड़ोगे प्रण या भीषण शोषण तोड़ोगे? बोलो साथी! क्या...
Rajesh Joshi

पृथ्वी का चक्कर

यह पृथ्वी सुबह के उजाले पर टिकी है और रात के अंधेरे पर यह चिड़ियों के चहचहाने की नोक पर टिकी है और तारों की झिलमिल लोरी पर तितलियाँ...
Harivansh Rai Bachchan

कवि के मुख से : मधुशाला

ऑल इण्डिया रेडियो, लखनऊ, से प्रसारित, 1941 मेरी सबसे पहली रचना 'तेरा हार' 1932 में प्रकाशित हुई थी। उसकी प्रशंसा मैंने पत्रों में पढ़ी थी...
Dictatorship

सुनो तानाशाह!

सुनो तानाशाह! एक दिन चला जाऊँगा एक नियत दिन जो कई वर्षों से मेरी प्रतीक्षा में बैठा है मेरी जिजीविषा का एक दिन जिसका मुझे इल्म तक नहीं है— क्या...
Bhagat Singh

सत्याग्रह और हड़तालें

'भगत सिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़' से जून, 1928 'किरती' में इन दो विषयों पर टिप्पणियाँ छपीं। भगतसिंह 'किरती' के सम्पादक मण्डल...
Mahadevi Verma

नारीत्व का अभिशाप

'शृंखला की कड़ियाँ' से चाहे हिन्दू नारी की गौरव-गाथा से आकाश गूँज रहा हो, चाहे उसके पतन से पाताल काँप उठा हो परन्तु उसके लिए...
Sheen Kaaf Nizam

कभी जंगल, कभी सहरा, कभी दरिया लिख्खा

कभी जंगल, कभी सहरा, कभी दरिया लिख्खा अब कहाँ याद कि हम ने तुझे क्या-क्या लिख्खा शहर भी लिक्खा, मकाँ लिक्खा, मोहल्ला लिखा हम कहाँ के थे...
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