Tag: दूरी

Rakhi Singh

दूरियों से कोई पीड़ा ख़त्म नहीं होती

'Dooriyon Se Koi Peeda Khatm Nahi Hoti', a poem by Rakhi Singh कई दिनों से कलाई के पास की नस में तीखा-सा दर्द रह रहा है डॉक्टर...
Shweta Rai

दूरियाँ

'Dooriyan', poems by Shweta Rai 1 आगे बढ़ जाने से ज़्यादा दुरूह होता है पीछे मुड़कर न देखना ज़रा-सी शिथिल होती देह में उग आता है बीमार मन जो जानता...
Balbir Singh Rang

अभी निकटता बहुत दूर है

'Abhi Nikatata Bahut Door Hai', Hindi Kavita by Balbir Singh Rang अभी निकटता बहुत दूर है, अभी सफलता बहुत दूर है, निर्ममता से नहीं, मुझे तो ममता...
Balraj Sahni

उस दूर खो गए युग की याद में

...तुझे याद है प्रेयसी, एक बार जब 'अलापत्थर झील' के निर्मल शीतल जल प्रसार की ढलान पर, आ उतरी थी सेना सी पिकनिक करने, हम सबके परिवारों...
Hasrat Mohani

देखना भी तो उन्हें दूर से देखा करना

देखना भी तो उन्हें दूर से देखा करना शेवा-ए-इश्क़ नहीं हुस्न को रुस्वा करना इक नज़र भी तेरी काफ़ी थी प-ए-राहत-ए-जाँ कुछ भी दुश्वार न था मुझको...
Muktibodh

मैं तुम लोगों से दूर हूँ

यह कविता यहाँ सुनें: https://youtu.be/0UzY9lHWRUw 'Main Tum Logon Se Door Hoon', a poem by Gajanan Madhav Muktibodh मैं तुम लोगों से इतना दूर हूँ तुम्हारी प्रेरणाओं से मेरी...
Gopal Singh Nepali

दूर जाकर न कोई बिसारा करे

दूर जाकर न कोई बिसारा करे, मन दुबारा-तिबारा पुकारा करे। यूँ बिछड़कर न रतियाँ गुज़ारा करे, मन दुबारा-तिबारा पुकारा करे। मन मिला तो जवानी रसम तोड़ दे, प्यार निभता...
Khadija Mastoor

अपने आँगन से दूर

विभाजन के बाद जिन शरणार्थियों का जहाँ दाव लगा, उन्होंने उन घरों और वस्तुओं पर अधिकार कर लिया, और यह सरहद के दोनों तरफ हुआ! ऐसे में आलिया को क्या पता कि उसके मामू उसे किन के घर ले आए हैं और यह जो मूर्ति रखी है, जिसके आसपास फूल पड़े हैं और एक पीला डोरा लटक रहा है, यह कोई ख़ास मूर्ति है या सिर्फ एक खिलौना!
Rahul Boyal

दूरियाँ

"जमाना जिसे ग़ुमराही कहता है, पाँवों को रौंदता हुआ दिल उसे सुकून कहता है।" "किसी छत की सीढ़ियों से जब कोई बच्चा तेज़ी से उतरता है तो दिल दहलता है और मुँह से डाँट और हिदायतें निकलती हैं। शायद सब ऐसे ही सीखते हैं। छत से फ़र्श तक की दूरी दहलते-दहलाते पूरी कर ही ली जाती है, कभी चोट खाकर, कभी यूँ ही। सबको ख़बर होती है कि लौटकर फ़र्श पर आना ही है।"
Moon, Night, Dark, Sky

लॉन्ग-डिस्टेन्स रिलेशनशिप

तुम ये खिड़की देख रहे हो न इसी में से आता-जाता है चाँद बादलों से चोरी-छुपे आसमान से झूठ बोल के मेरे कमरे में रौशनी बिखेर देता है और पता...
meeraji

दूर किनारा

फैली धरती के सीने पे जंगल भी हैं लहलहाते हुए और दरिया भी हैं दूर जाते हुए और पर्वत भी हैं अपनी चुप में मगन और सागर भी...

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Corona, Covid

उसकी आँखें खुली रहनी चाहिए थीं

(कोरोना से गुज़र गई एक अपरिचित की फ़ेसबुक प्रोफ़ाइल से गुज़रते हुए) 8 मई, 2021 सत्ता है मछली की आँख और दोनों कर्ता-धर्ता अर्जुन और 'ठाकुर' बने थे चूक...
Usha Priyamvada

छुट्टी का दिन

पड़ोस के फ़्लैट में छोटे बच्चे के चीख़-चीख़कर रोने से माया की नींद टूट गई। उसने अलसाई पलकें खोलकर घड़ी देखी, पौने छह बजे...
Sudha Arora

अकेली औरत का हँसना

अकेली औरत ख़ुद से ख़ुद को छिपाती है। होंठों के बीच क़ैद पड़ी हँसी को खींचकर जबरन हँसती है और हँसी बीच रास्ते ही टूट जाती है... अकेली औरत...
Shamsher Bahadur Singh

चुका भी हूँ मैं नहीं

चुका भी हूँ मैं नहीं कहाँ किया मैनें प्रेम अभी। जब करूँगा प्रेम पिघल उठेंगे युगों के भूधर उफन उठेंगे सात सागर। किन्तु मैं हूँ मौन आज कहाँ सजे मैनें साज अभी। सरल से भी...
Franz Kafka, Milena Jesenska

मिलेना को लिखे काफ़्का के पत्रों के कुछ अंश

किताब अंश: 'लेटर्स टू मिलेना' अनुवाद: लाखन सिंह प्रिय मिलेना, काश! ऐसा हो कि दुनिया कल ख़त्म हो जाए। तब मैं अगली ही ट्रेन पकड़, वियना में...
Woman in front of a door

सुबह

कितना सुन्दर है सुबह का काँच के शीशों से झाँकना इसी ललछौंहे अनछुए स्पर्श से जागती रही हूँ मैं बचपन का अभ्यास इतना सध गया है कि आँखें खुल ही जाती...
Rohit Thakur

सोलेस इन मे

कौन आएगा मई में सांत्वना देने कोई नहीं आएगा समय ने मृत्यु का स्वांग रचा है अगर कोई न आए तो बारिश तुम आना आँसुओं की तरह दो-चार बूँदों की...
Fist, Protest, Dissent

एक छोटी-सी लड़ाई

मुझे लड़नी है एक छोटी-सी लड़ाई एक झूठी लड़ाई में मैं इतना थक गया हूँ कि किसी बड़ी लड़ाई के क़ाबिल नहीं रहा। मुझे लड़ना नहीं अब— किसी...
Saadat Hasan Manto

मंटो

मंटो के मुताल्लिक़ अब तक बहुत कुछ लिखा और कहा जा चुका है। उसके हक़ में कम और ‎ख़िलाफ़ ज़्यादा। ये तहरीरें अगर पेश-ए-नज़र...
Sahir Ludhianvi

ख़ून फिर ख़ून है

ज़ुल्म फिर ज़ुल्म है, बढ़ता है तो मिट जाता है ख़ून फिर ख़ून है, टपकेगा तो जम जाएगा ख़ाक-ए-सहरा पे जमे या कफ़-ए-क़ातिल पे जमे फ़र्क़-ए-इंसाफ़ पे...
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