Tag: Father Son

Javed Akhtar

मेले

बाप की उँगली थामे इक नन्हा-सा बच्चा पहले-पहल मेले में गया तो अपनी भोली-भाली कंचों जैसी आँखों से इक दुनिया देखी ये क्या है और वो क्या है सब उसने पूछा बाप...
Nirmal Gupt

सम्वाद का पुल

'Samvad Ka Pul', a poem by Nirmal Gupt मैं लिखा करता था अपने पिता को ख़त जब मैं होता था उद्विग्न, व्यथित या फिर बहुत उदास, जब मुझे दिखायी देती थीं अपनी...
Anupam Mishra

स्नेह भरी उँगली

"यहीं नौवीं में हिन्दी पढ़ाते समय जब किसी एक सहपाठी ने हमारे हिन्दी के शिक्षक को बताया कि मैं भवानी प्रसाद मिश्र का बेटा हूँ तो उन्होंने उसे 'झूठ बोलते हो' कह दिया था। बाद में उनने मुझसे भी लगभग उसी तेज आवाज में पिता का नाम पूछा था। घर का पता पूछा था, फिर किसी शाम वे घर भी आए। अपनी कविताएँ भी मन्ना को सुनाईं। मन्ना ने भी कुछ सुनाया था। उस टेंटवाले स्कूल में ऐसे कवि का बेटा? मन्ना की प्रसिद्धि हमें इन्हीं मापदण्डों, प्रसंगों से जानने मिली थीं।"

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Recent Posts

Ramkumar Krishak

हम नहीं खाते, हमें बाज़ार खाता है

हम नहीं खाते, हमें बाज़ार खाता है आजकल अपना यही चीज़ों से नाता है पेट काटा, हो गई ख़ासी बचत घर में है कहाँ चेहरा, मुखौटा मुस्कुराता है नाम...
Majrooh Sultanpuri

मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर

जब हुआ इरफ़ाँ तो ग़म आराम-ए-जाँ बनता गया सोज़-ए-जानाँ दिल में सोज़-ए-दीगराँ बनता गया रफ़्ता रफ़्ता मुंक़लिब होती गई रस्म-ए-चमन धीरे धीरे नग़्मा-ए-दिल भी फ़ुग़ाँ बनता गया मैं...
Pravad Parv - Naresh Mehta

प्रतिइतिहास और निर्णय

कविता अंश: प्रवाद पर्व महानुभावो! उस अनाम साधारण जन के तर्जनी उठाने में सम्भव है कोई औचित्य न हो परन्तु चूँकि वह तर्जनी अकेली है अतः उसकी सत्यता पर सन्देह भी स्वाभाविक...
Naresh Saxena

इस बारिश में

जिसके पास चली गई मेरी ज़मीन उसी के पास अब मेरी बारिश भी चली गई अब जो घिरती हैं काली घटाएँ उसी के लिए घिरती हैं कूकती हैं कोयलें...
Arvind Yadav

अरविन्द यादव की कविताएँ

गिद्ध आज अचानक मेरे शहर में दिखायी देने लगे झुण्ड के झुण्ड गिद्धों के देखते ही देखते शहर के हृदय पर एक बडे़ मैदान में होने लगा एक विशाल सभा...
Sahej Aziz

बंटू / दो हज़ार पचानवे

उसने शायद खाना नहीं खाया था। रोज़ तो सो जाता था दुबक के फैल के रेल प्लेटफ़ॉर्म पे बेंच के नीचे। क्यों सता रहा है आज उसे बारिश का शोर गीली चड्ढी और...
Sahej Aziz

नींद क्यों रात-भर नहीं आती

रात को सोना कितना मुश्किल काम है दिन में जागने जैसा भी मुश्किल नहीं पर, लेकिन तक़रीबन उतना ही न कोई पत्थर तोड़ा दिन-भर न ईंट के भट्ठे में...
Sahej Aziz

क्रांति: दो हज़ार पचानवे

हा हा हा हा हा हा यह भी कैसा साल है मैं ज़िंदा तो हूँ नहीं पर पढ़ रहा है मुझको कोई सोच रहा है कैसे मैंने सोचा है तब...
Sarveshwar Dayal Saxena

देशगान

क्या ग़ज़ब का देश है, यह क्या ग़ज़ब का देश है। बिन अदालत औ मुवक्किल के मुक़दमा पेश है। आँख में दरिया है सबके दिल में है...
Balamani Amma

माँ भी कुछ नहीं जानती

"बतलाओ माँ मुझे बतलाओ कहाँ से, आ पहुँची यह छोटी-सी बच्ची?" अपनी अनुजाता को परसते-सहलाते हुए मेरा पुत्र पूछ रहा था मुझसे; यह पुराना सवाल जिसे हज़ारों लोगों ने पहले भी बार-बार पूछा है। प्रश्न...
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