Tag: पिता

om nagar

ओम नागर की कविताएँ

प्रस्तुति: विजय राही पिता की वर्णमाला पिता के लिए काला अक्षर भैंस बराबर। पिता नहीं गए कभी स्कूल जो सीख पाते दुनिया की वर्णमाला। पिता ने कभी नहीं किया काली...
Father Daughter, Girl

मुहर-भर रहे पिता

उन लड़कियों ने जाना पिता को एक अडिग आदेश-सा, एक मुहर-भर रहे पिता बेटियों के दस्तावेज़ों पर। कहाँ जाना, क्या खाना, क्या पढ़ना, निर्धारित कर, पिता ने निभायीं ज़िम्मेदारियाँ अपनी, बहरे रहे...
Old age, Hand

बुरा सपना

'Bura Sapna', a poem by Amar Dalpura मैं देख रहा हूँ बहुत पुरानी खाट पर पिता की नींद इस तरह चिपकी है जैसे नंगी पीठ पर नींद की करवटें...
Rahul Boyal

शिशुओं का रोना

'Shishuon Ka Rona', a poem by Rahul Boyal मेरी दृष्टि में सभी शिशुओं के रोने का स्वर तक़रीबन एक जैसा होता है और हँसने की ध्वनि भी लगभग...
Vivek Chaturvedi

पिता

'Pita', Hindi Kavita by Vivek Chaturvedi पिता! तुम हिमालय थे पिता! कभी तो कितने विराट पिघलते हुए से कभी बुलाते अपनी दुर्गम चोटियों से भी और ऊपर कि आओ- चढ़...
Nirmal Gupt

सम्वाद का पुल

'Samvad Ka Pul', a poem by Nirmal Gupt मैं लिखा करता था अपने पिता को ख़त जब मैं होता था उद्विग्न, व्यथित या फिर बहुत उदास, जब मुझे दिखायी देती थीं अपनी...
Nirmal Gupt

पिता और व्हीलचेयर

'Pita Aur Wheelchair', a poem by Nirmal Gupt पिता व्हीलचेयर पर बैठे थे एकदम इत्मिनान के साथ, उनके अलावा सबको पता था वह हो सकते हैं वहाँ से किसी पल...
Father, Hands, Child, Hold

पितृ-स्मृति, पिता की आख़िरी साँस

Poems: Santwana Shrikant पितृ-स्मृति दीवार पर टँगी तस्वीर मेरे पिता की, और उस पर चढ़ी माला, खूँटी पर टँगी उनकी शर्ट, घड़ी जो आसपास ही पड़ी होगी, उनके न होने की कमी पूरी नहीं...
Posham Pa

टेलिपैथी

लकी राजीव की कहानी 'टेलीपैथी' | 'Telepathy', a story by Lucky Rajeev "बेटा, ये पलाजो क्या होता है?" मैंने मिनी के बालों में तेल लगाते...
Posham Pa

सम्बल

'Sambal', a poem by Mohit Payal ज़िन्दगी प्रश्न पूछती है कभी कठोर, कभी अनुत्तरदायी लेकिन रास्ते भी सुझाती है सरल से पर अनखोजे हुए ज़िन्दगी का स्वभाव बिल्कुल मेरे...
Posham Pa

रोटी बनाते हुए पिता

'Roti Banate Hue Pita', a poem by Usha Dashora मेरे छोटे हाथ में चीनी के दाने होते दूसरे हाथ में पिता की उँगली और पाँवों में सात...
Deepak Jaiswal

बाबूजी

'Babuji', a poem by Deepak Jaiswal बाबूजी की मूँछ बहुत बार प्रेमचन्द की तरह लगती है कई आलोचक बताते हैं प्रेमचन्द ने अपनी मूँछ लमही के रघु नाई से हुबहू...

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