Tag: पिता

Viren Dangwal

रुग्ण पिताजी, शव पिताजी, ख़त्म पिताजी, स्मृति-पिता

रुग्ण पिताजी रात नहीं कटती? लम्‍बी, यह बेहद लम्‍बी लगती है? इसी रात में दस-दस बारी मरना है, जीना है इसी रात में खोना-पाना-सोना-सीना है ज़ख़्म इसी में...
David Bottoms

डेविड बॉटम्स की कविता ‘पिता का बायाँ हाथ’

कविता: पिता का बायाँ हाथ (My Father's Left Hand) कवि: डेविड बॉटम्स (David Bottoms) अनुवाद: आदर्श भूषणकभी-कभी पिता का हाथ उनके घुटनों पर फिरता है अजीब गोलाइयों...
Sharon Olds

शैरन ओल्ड्स की कविता ‘उनकी चुप्पी’

शैरन ओल्ड्स (Sharon Olds) अमेरिकी कवयित्री हैं और न्यू यॉर्क यूनिवर्सिटी में क्रिएटिव राइटिंग पढ़ाती हैं। उन्हें कविता में पुलत्ज़र पुरस्कार प्राप्त है। यहाँ...
Sarveshwar Dayal Saxena

दिवंगत पिता के प्रति

1सूरज के साथ-साथ सन्ध्या के मंत्र डूब जाते थे, घण्टी बजती थी अनाथ आश्रम में भूखे भटकते बच्चों के लौट आने की, दूर-दूर तक फैले खेतों पर, धुएँ में...
Old age, Hand

पिता की मृत्यु

किसी अधलिखी चिट्ठी की तरह चले गए पिता सब कुछ बाक़ी रह गया धरा का धरा अब वह कभी पूरा नहीं हो पाएगावो स्याही सूख रही है...
Swayam Prakash

पिताजी का समय

अपने घर में मैं परम स्वतंत्र था। जैसे चाहे रहता, जो चाहे करता। मर्ज़ी आती जहाँ जूते फेंक देता, मन करता जहाँ कपड़े। जगह-जगह...
Sylvia Plath

सिल्विया प्लाथ की कविता ‘डैडी’

अब और नहीं आप नहीं कर सकते, नहीं कर सकते आप अपने जूते में मुझे पैरों की तरह रखकर मुझ बेचारी अभागिन को तीस सालों से साँस लेने और छींकने...
Faheem Ahmad

फहीम अहमद की कविताएँ

मेरी हथेलियों में सारे रस्ते वो मुस्कान लाने वाली एक पंक्ति कसमसाती रही 1बाप के झुके हुए काँधे अंदर धँसते जा रहे गाल माथे की फड़फड़ाती हुई नसों को देखकर मैं...
Rabindranath Tagore

इच्छा-पूर्ण

अनुवाद: रत्ना रॉयसुबलचन्द्र के बेटे का नाम सुशीलचन्द्र था। लेकिन हमेशा नाम के अनुरूप व्यक्ति भी हो ऐसा क़तई ज़रूरी नहींं। तभी तो सुबलचन्द्र...
Gaurav Bharti

कविताएँ: जुलाई 2020 (द्वितीय)

पिता इस साल जनवरी में नहीं रहे मेरे पिता के पिताउनके जाने के बाद इन दिनों पिता के चेहरे को देखकर समझ रहा हूँ पिता के जाने का दुःखदुःख,...
Father, Hands, Child, Hold

पीठ पर पहाड़

पीठ पर पहाड़ ढोते आदमी की उपमा पढ़कर छुटपन से ही मुझे हमेशा याद आयी पिता की तनी हुई रीढ़पिता की पीठ पर ज्येष्ठ पुत्र होने के सम्मान...
Father, Hands, Child, Hold

चार सौ छत्तीस दिन

मैं उन्हें चार सौ छत्तीस दिन गिनूँगा या थोड़े संकुचित मात्रक में क़रीब चौदह महीने गिनने को मैं गिन सकता था एक साल, दो महीने, बारह दिन पर...

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Upma Richa

या देवी

1सृष्टि की अतल आँखों में फिर उतरा है शक्ति का अनंत राग धूम्र गंध के आवक स्वप्न रचती फिर लौट आयी है देवी रंग और ध्वनि का निरंजन...
Chen Kun Lun

चेन कुन लुन की कविताएँ

चेन कुन लुन का जन्म दक्षिणी ताइवान के काओशोंग शहर में सन 1952 में हुआ। वह एक सुधी सम्पादक रहे हैं। चेन लिटरेरी ताइवान...
Bharat Ke Pradhanmantri - Rasheed Kidwai

किताब अंश: भारत के प्रधानमंत्री

सुपरिचित पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक रशीद किदवई की किताब 'भारत के प्रधानमंत्री : देश, दशा, दिशा' भारत के पहले प्रधानमंत्री से लेकर वर्तमान प्रधानमंत्री...
Muktibodh - Premchand

मेरी माँ ने मुझे प्रेमचन्द का भक्त बनाया

एक छाया-चित्र है। प्रेमचन्द और प्रसाद दोनों खड़े हैं। प्रसाद गम्भीर सस्मित। प्रेमचन्द के होंठों पर अस्फुट हास्य। विभिन्न विचित्र प्रकृति के दो धुरन्धर...
Manish Kumar Yadav

लगभग विशेषण हो चुका शासक

किसी अटपटी भाषा में दिए जा रहे हैं हत्याओं के लिए तर्क'एक अहिंसा है जिसका सिक्का लिए गांधीजी हर शहर में खड़े हैं लेकिन जब भी सिक्का उछालते...
Village, Farmer

किसान को कौन जानता है?

हवा को जितना जानता है पानी कोई नहीं जानतापानी को जितना जानती है आग कोई नहीं जानताआग को जितना जानते हैं पेड़ कोई नहीं जानतापेड़ को जितना...
premchand

सवा सेर गेहूँ

किसी गाँव में शंकर नाम का एक कुरमी किसान रहता था। सीधा-सादा ग़रीब आदमी था, अपने काम-से-काम, न किसी के लेने में, न किसी...
Unsocial Network - Dilip Mandal, Geeta Yadav

वे आपके बारे में बहुत ज़्यादा जानते हैं (किताब अंश: अनसोशल नेटवर्क)

'अनसोशल नेटवर्क' किताब भारत के विशिष्ट सन्दर्भों में सोशल मीडिया का सम्यक् आकलन प्रस्तुत करती है। जनसंचार का नया माध्यम होने के बावजूद, सोशल...
Prayers, Joined Hands

अनुत्तरित प्रार्थना

'परिवर्तन प्रकृति का नियम है' यह पढ़ते-पढ़ाते वक़्त मैंने पूरी शिद्दत के साथ अपने रिश्तों में की स्थिरता की कामनाप्रकृति हर असहज कार्य भी पूरी सहजता के...
Women sitting

अठन्नी, चवन्नी और क्रमशः

इस बार उन्हें नहीं था मोह स्वर्ण-मृग का फिर भी खींची गई थीं लक्ष्मण रेखाएँवे पढ़ीं, आगे बढ़ीं लक्ष्मण रेखाएँ लाँघकर रावण से जा भिड़ींगूँजते आए थे स्वर नेपथ्य...
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