Tag: Gajanan Madhav Muktibodh

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मलय के नाम मुक्तिबोध का पत्र

राजनाँद गाँव 30 अक्टूबर प्रिय मलयजीआपका पत्र यथासमय मिल गया था। पत्रों द्वारा आपके काव्य का विवेचन करना सम्भव होते हुए भी मेरे लिए स्वाभाविक नहीं...
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तुम्हारी असलियत

तुम्हारी असलियत की संगदिल ख़ूँख़ार छाती पर हमारी असलियत बेमौत हावी है। तुम्हारी मौत आयी है हमारे हाथ से होगी, सुलगते रात में जंगल, लपट-से लाल, गहरा लाल काला...
Muktibodh - Shamsher Bahadur Singh

शमशेर बहादुर सिंह के नाम पत्र

शमशेर बहादुर सिंह को मुक्तिबोध का पत्र घर न० 86, विष्णु दाजी गली, नई शुक्रवारी, सरकल न० 2 नागपुर प्रिय शमशेर,कुछ दिन पूर्व श्री प्रभाकर पुराणिक को लिखे...
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प्रश्‍न

एक लड़का भाग रहा है। उसके तन पर केवल एक कुर्ता है और एक धोती मैली-सी! वह गली में भाग रहा है मानो हज़ारों...
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जनता का साहित्य किसे कहते हैं?

ज़िन्दगी के दौरान जो तजुर्बे हासिल होते हैं, उनसे नसीहतें लेने का सबक़ तो हमारे यहाँ सैकड़ों बार पढ़ाया गया है। होशियार और बेवक़ूफ़...
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एक-दूसरे से हैं कितने दूर

एक-दूसरे से हैं कितने दूर कि जैसे बीच सिन्धु है, एक देश के शैल-कूल पर खड़ा हुआ मैं और दूसरे देश-तीर पर खड़ी हुईं तुम। फिर भी...
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बहुत दिनों से

मैं बहुत दिनों से, बहुत दिनों से बहुत-बहुत-सी बातें तुमसे चाह रहा था कहना और कि साथ यों साथ-साथ फिर बहना, बहना, बहना मेघों की आवाज़ों से कुहरे की...
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ब्रह्मराक्षस का शिष्य

'Brahmarakshas Ka Shishya', a story by Gajanan Madhav Muktibodhउस महाभव्य भवन की आठवीं मंज़िल के ज़ीने से सातवीं मंज़िल के ज़ीने की सूनी-सूनी सीढ़ियों पर...
Muktibodh

मैं उनका ही होता

मैं उनका ही होता जिनसे मैंने रूप भाव पाए हैं। वे मेरे ही हिये बँधे हैं जो मर्यादाएँ लाए हैं। मेरे शब्द, भाव उनके हैं मेरे पैर और पथ मेरा, मेरा...
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तुम्हारा पत्र आया

तुम्हारा पत्र आया, या अँधेरे द्वार में से झाँककर कोई झलक अपनी, ललक अपनी कृपामय भाव-द्युति अपनी सहज दिखला गया मानो हितैषी एक! हमारे अन्धकाराच्छन्न जीवन में विचरता है मनोहर सौम्य...
Muktibodh

जंक्‍शन

रेलवे स्‍टेशन, लम्बा और सूना! कड़ाके की सर्दी! मैं ओवरकोट पहने हुए इत्‍मीनान से सिगरेट पीता हुआ घूम रहा हूँ।मुझे इस स्‍टेशन पर अभी...
Muktibodh

भूल-ग़लती

भूल-ग़लती आज बैठी है जिरहबख्तर पहनकर तख्त पर दिल के, चमकते हैं खड़े हथियार उसके दूर तक, आँखें चिलकती हैं नुकीले तेज़ पत्थर सी, खड़ी हैं सिर झुकाये सब कतारें बेजुबाँ बेबस...

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कविता सरहदों के पार, हक़ीक़त के बीच दरार और कुछ बेतरतीब विचार

वरिष्ठ ताइवानी कवि एवं आलोचक ली मिन-युंग की कविताओं के हिन्दी अनुवाद का संकलन 'हक़ीक़त के बीच दरार' जुलाई में पाठकों तक पहुँचा। साहित्यिक...
Thaharti Sanson Ke Sirhane Se - Ananya Mukherjee

दुःख, दर्द और उम्मीद का मौसम (अनन्य मुखर्जी की कैंसर डायरी)

'ठहरती साँसों के सिरहाने से' अनन्या मुखर्जी की डायरी है जो उन्होंने 18 नवम्बर, 2018 को स्तन कैंसर से लड़ाई हार जाने से पहले...
Kantha - Shyam Bihari Shyamal

कंथा : जयशंकर प्रसाद के जीवन और युग पर केन्द्रित उपन्यास

मूर्धन्य साहित्यकार जयशंकर प्रसाद का साहित्य सर्वसुलभ है लेकिन उनके 'तुमुल कोलाहल' भरे जीवन की कहानी से दुनिया अब तक प्रायः अपरिचित रही है।...
Hungry, Poor

अहमद नियाज़ रज़्ज़ाक़ी की नज़्में

अब अब कहाँ है ज़बान की क़ीमत हर नज़र पुर-फ़रेब लगती है हर ज़ेहन शातिराना चाल चले धड़कनें झूठ बोलने पे तुलीं हाथ उठते हैं बेगुनाहों पर पाँव अब रौंदते...
Man lying on footpath, Homeless

तीन चित्र : स्वप्न, इनकार और फ़ुटपाथ पर लेटी दुनिया

1 हम मृत्यु-शैय्या पर लेटे-लेटे स्वप्न में ख़ुद को दौड़ता हुआ देख रहे हैंऔर हमें लगता है हम जी रहे हैं हम अपनी लकड़ियों में आग के...
Fair, Horse Ride, Toy

मेला

1 हर बार उस बड़ी चरखी पर जाता हूँ जो पेट में छुपी हुई मुस्कान चेहरे तक लाती है कई लोग साल-भर में इतना नहीं हँसते जितना खिलखिला लेते हैं...
Man holding train handle

आधुनिकता

मैं इक्कीसवीं सदी की आधुनिक सभ्यता का आदमी हूँ जो बर्बरता और जंगल पीछे छोड़ आया हैमैं सभ्य समाज में बेचता हूँ अपना सस्ता श्रम और दो वक़्त की...
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ख़ुशिया सोच रहा था।बनवारी से काले तम्बाकूवाला पान लेकर वह उसकी दुकान के साथ लगे उस संगीन चबूतरे पर बैठा था जो दिन के...
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वह— जिसकी पीठ हमारी ओर है अपने घर की ओर मुँह किये जा रहा है जाने दो उसे अपने घर।हमारी ओर उसकी पीठ— ठीक ही तो है मुँह यदि होता तो...
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