Tag: ईश्वर

Nishant

कविता की परीक्षा

'Kavita Ki Pareeksha', a poem by Nishant Upadhyay ईश्वर की परिभाषा क्या है? हर धर्म के अपने ईश्वर होते हैं। धर्म की परिभाषा क्या है? धर्म ईश्वर से...
God, Mother, Abstract

ईश्वर की खोज

'Ishwar Ki Khoj', a poem by Sudheer Dongre गर्दन उठाकर ईश्वर को आकाश में खोजने वालों तुमने ही धरती को रक्तपात दिया है तुमने ही हमें मज़हबों में...
Harshita Panchariya

भ्रम

स्मृतियों में सहेजने के तौर पर दिए गए सभी चुम्बन पीड़ा में ऐसे भ्रम बनाए रखते हैं, मानो आँख खुलते ही ईश्वर सामने नज़र आ जाएगा। यूँ बंद आँखों के...
Naveen Sagar

ऐसा सोचना ठीक नहीं

नवीन सागर की कविता 'ऐसा सोचना ठीक नहीं' | 'Aisa Sochna Theek Nahi', a poem by Naveen Sagar शेर-चीता नहीं, मनुष्‍य एक हिंसक प्राणी है। हिंसा का...
God, Mother, Abstract

ईश्वर नहीं आया

कहाँ हैं वो! जो अब भी कहते हैं कि ईश्वर सब देख रहा है! मैं पूछना चाहती हूँ तुम्हारे ईश्वर ने कब-कब क्या-क्या देखा? उसे ख़ुद की स्तुतिगान और प्रशंसा सुनने...
Gulzar

ख़ुदा

'Khuda', a poem by Gulzar पूरे का पूरा आकाश घुमा कर बाज़ी देखी मैंने! काले घर में सूरज रख के तुमने शायद सोचा था मेरे सब मोहरे...
premchand

बासी भात में खुदा का साझा

शाम को जब दीनानाथ ने घर आकर गौरी से कहा कि मुझे एक कार्यालय में पचास रुपये की नौकरी मिल गई है, तो गौरी...
God

रिक्त मन

अंजुरी भर प्रार्थनाएँ बड़ी मुश्किल से जुटा पाती हूँ विषमता से उपजा आर्तगान! श्रद्धा के दुर्लभ पुष्प आस के तरु से सहेजकर रखती हूँ विभिन्न रंग की अनगिनत कामना के संग। हे देव! विषमता...

मेरा ईश्वर छली नहीं है

पता नहीं कितने तरीके ईजाद किए हैं मनुष्य ने तुम्हें समृद्ध बनाने के लिए। हर कोस पर तुम्हारा स्वरूप बदला है पानी के साथ पर स्मरण रहे तुम्हारे ईश्वर ने तुम्हारी आत्मा को उतना...
adarsh bhushan

मैं तो कहीं भी नहीं दिखता

मैं तो कहीं भी नहीं दिखता, ना शाश्वत ना सीमित; मेरा दिखना जायज़ भी नहीं। शायद मुझे तुम धर्म में देखना शुरू कर दो या रंगो में, जो युगान्तरकालीन मरणशील हाड़-मांस...

एक वोट से हारे भगवान

संविधान का जब हो रहा था निर्माण तब आया था एक व्यवधान सवाल ये था कि आखिर संविधान की शुरुआत होगी किसके नाम। सच भी ये था कई...
God

ईश्वर से अनुबन्ध है प्रेम का

जब समंदर की हरहराती लहरें सब लील लेने को आतुर हो उठती हैं नदियाँ नष्ट कर डालती हैं अपनी गोद में पलती और जवान होती सभ्यताओं को भी जंगलों के पेड़...

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