Tag: Grief

Payal Bhardwaj

पायल भारद्वाज की कविताएँ

दुःख जुड़ा रहा नाभि से नाराज़गी का बोझ उठा सकें इतने मज़बूत कभी नहीं रहे मेरे कंधे'दोष मेरा नहीं, तुम्हारा है' यह कहने के बाद मन ने...
Rainer Maria Rilke

रेनर मारिया रिल्के की तीन कविताएँ

मूल कविताएँ: रेनर मारिया रिल्के अनुवाद: उसामा हमीद दुखड़ा Lament सब कुछ दूर है और बहुत पहले ख़त्म हो चुका है। मुझे लगता है मेरे ऊपर चमकता हुआ तारा करोड़ों बरस पहले...
Dark, Face, Girl, Woman, Sad

ख़तरनाक दुःख

मेरा दुःख नितान्त मेरा था जो कुछ-कुछ मेरी माँ या उनके जैसी तमाम औरतों के दुःख-सा ग़ैर-ज़रूरी मगर ख़तरनाक घोषित था जिन्हें घर-गृहस्थी में फँस, न जीने की फ़ुर्सत थी न मरने की।जिनके...
Harish Bhadani

सभी सुख दूर से गुज़रें

सभी सुख दूर से गुज़रें गुज़रते ही चले जाएँ मगर पीड़ा उमर भर साथ चलने को उतारू है!हमको सुखों की आँख से तो बाँचना आता नहीं हमको...
Gaurav Bharti

दुःख

सपनों के डर से मैंने कई रातें दिन की तरह बितायीं और दिन में बेहोश होकर सोया बहुत बाद में मुझे मालूम हुआ नींद और बेहोशी में फ़र्क़ होता...
Gopaldas Neeraj

दुःख ने दरवाज़ा खोल दिया

मैंने तो चाहा बहुत कि अपने घर में रहूँ अकेला, पर— सुख ने दरवाज़ा बन्द किया, दुःख ने दरवाज़ा खोल दिया।मन पर तन की साँकल...
Man, Sad, Black, Abstract, Grief

दोपहर का भोजन

दुःख दुःख को सहना कुछ मत कहना— बहुत पुरानी बात है।दुःख सहना, पर सब कुछ कहना यही समय की बात है।दुःख को बना के एक कबूतर बिल्ली को अर्पित कर...
Ramesh Ranjak

जिस दिन से आए

जिस दिन से आए उस दिन से घर में यहीं पड़े हैं दुःख कितने लंगड़े हैं!पैसे, ऐसे अलमारी से फूल चुरा ले जाएँ बच्चे जैसे फुलवारी से दंड नहीं दे पाता यद्यपि— रंगे हाथ...
Man Bahadur Singh

आदमी का दुःख

राजा की सनक ग्रहों की कुदृष्टि मौसमों के उत्पात बीमारी, बुढ़ापा, मृत्यु, शत्रु, भय प्रिय-बिछोह कम नहीं हैं ये दुःख आदमी पर!ऊपर से जब घर जलते हैं तो आदमी के दिन...
Umashankar Joshi

आत्मसंतोष

नहीं, नहीं, अब नहीं हैं रोनी हृदय की व्यथाएँजो जगत् व्यथा देता है, उसी जगत् को अब रचकर गाथाएँ व्यथा की वापस नहीं देनी हैं। दुःख...
Leeladhar Jagudi

दुःख की बात

निरर्थकताओं को सार्थकताओं में बदलने के लिए हम संघर्ष करते हैं बदहालियों को ख़ुशहालियों में बदलने के लिए हम संघर्ष करते हैं क्योंकि कमियाँ जब अभाव बन जाती...
Raghuvir Sahay

हमने यह देखा

यह क्या है जो इस जूते में गड़ता है यह कील कहाँ से रोज़ निकल आती है इस दुःख को रोज़ समझना क्यों पड़ता हैफिर कल...

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टी. एस. ईलियट के प्रति

पढ़ रहा था कल तुम्हारे काव्य कोऔर मेरे बिस्तरे के पास नीरव टिमटिमाते दीप के नीचे अँधेरे में घिरे भोले अँधेरे में घिरे सारे सुझाव, गहनतम संकेत! जाने...
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