Tag: heart

Naresh Saxena

तुम वही मन हो कि कोई दूसरे हो

कल तुम्हें सुनसान अच्छा लग रहा था आज भीड़ें भा रही हैं तुम वही मन हो कि कोई दूसरे हो! गोल काले पत्थरों से घिरे उस सुनसान...
Man, Sleep, Painting, Abstract, Closed Eyes, Face

तिजारत

बिक गया मन... झूठ और सच की लगी थी बोलियाँ और ख़रीदारों की थी लम्बी क़तारें वो, जो अपनों के कभी अपने ना हुए, ग़ैर की तकलीफ़ में हमदर्द थे जो पीठ पर अपनों के करते वार लेकिन, पाँव जिनके चूमते थे सामने से भाई, बेटा, बाप, माँ सबके बने थे ...पर नहीं थे। रात की तारीकी हाथों में छुपाए जो सुबह के मुँह पे कालिख पोत देते और बनकर रोशनाई के फ़रिश्ते अनगिनत दीये जलाकर झूमते थे वो सभी महँगे लिबासों में लिपटकर, चेहरे पर पहने तिरस्कारों का लहजा सड़क पे बोली लगाने आ गए थे। दाम जो भी चाहिए मुँह माँगा ले लो। झूठ हमको बेच दो, सच मार डालो; और चमड़ी सच की भी बेचो हमें ही। झूठ को हम सच बनाकर बेचेंगे... व्यापार है। खेलना जज़्बात से भी एक कारोबार है। मोल भावों का नहीं कुछ, फेंक डालो। आपके जज़्बात की क़ीमत मिलेगी ...बेच डालो। सोच कुछ पल; घर में फैली भूख, बीमारी को देखा बिलबिलाती बेटी, लाचारी को देखा भावनाओं को हथेली पर सजाए आ गया बाज़ार में, सूनी आँखें मूँदकर बिकने खड़ा क़तार में। वो लगी बोली - मेरे हाथों में रखकर चन्द सपने, छीन ली उसने मेरी भावों भरी वो पोटली। मैं अभावों में घिरा-सा, मैं डरा-सा अधमरा-सा। हतप्रभ-सा मूक-सा अवाक-सा हवन की समिधा, चिता की ख़ाक-सा... था खड़ा थामे विवशताओं का दामन... बिक गया मन।
Harivansh Rai Bachchan

ऐसे मैं मन बहलाता हूँ

सोचा करता बैठ अकेले, गत जीवन के सुख-दुःख झेले, दंशनकारी सुधियों से मैं उर के छाले सहलाता हूँ ऐसे मैं मन बहलाता हूँ! नहीं खोजने जाता मरहम, होकर अपने प्रति...
Woman with red scarf, Girl

उड़ता फिरता पगला मन ये

'Udta Phirta Pagal Man Yeh', a poem by Priyanki Mishra उड़ता फिरता पगला मन ये, हवा में लहराते किसी किशोरी के करारे रंगों वाले बांधनी दुपट्टे की...

मन की चिड़िया

'Man Ki Chidiya', Hindi Kavita by Shrikant Verma वह चिड़िया जो मेरे आँगन में चिल्लायी, मेरे सब पिछले जन्मों की संगवारिनी-सी इस घर आयी; मैं उसका उपकार चुकाऊँ...
Baba Nagarjuna

मन करता है

'Man Karta Hai', a poem by Baba Nagarjun मन करता है : नंगा होकर कुछ घण्टों तक सागर-तट पर मैं खड़ा रहूँ यों भी क्या कपड़ा मिलता...
Shamser Bahadur Singh

हमारे दिल सुलगते हैं

'Humare Dil Sulagte Hain', a poem by Shamsher Bahadur Singh लगी हो आग जंगल में कहीं जैसे, हमारे दिल सुलगते हैं। हमारी शाम की बातें लिये होती हैं...
Trilochan

खुले तुम्हारे लिए हृदय के द्वार

खुले तुम्हारे लिए हृदय के द्वार अपरिचित पास आओ! आँखों में सशंक जिज्ञासा मुक्ति कहाँ, है अभी कुहासा जहाँ खड़े हैं, पाँव जड़े हैं स्तम्भ शेष भय की परिभाषा हिलो...
Abstract, Heart, Mind, Dream

मन के पार

'Man Ke Paar', a poem by Preeti Karn श्रेष्ठतम कविता लिखना उस वक़्त सम्भव हुआ होगा जब खाई को पाटने के लिए नहीं बची रही होगी कच्ची मिट्टी की ढेर। ऊँचे टीलों की...
Ibne Insha

दिल पीत की आग में जलता है

'Dil Peet Ki Aag Mein Jalta Hai', a nazm by Ibne Insha दिल पीत की आग में जलता है, हाँ जलता रहे, उसे जलने दो इस...
Majaz Lakhnavi

नज़्र-ए-दिल

अपने दिल को दोनों आलम से उठा सकता हूँ मैं क्या समझती हो कि तुम को भी भुला सकता हूँ मैं कौन तुमसे छीन सकता है...
God

रिक्त मन

अंजुरी भर प्रार्थनाएँ बड़ी मुश्किल से जुटा पाती हूँ विषमता से उपजा आर्तगान! श्रद्धा के दुर्लभ पुष्प आस के तरु से सहेजकर रखती हूँ विभिन्न रंग की अनगिनत कामना के संग। हे देव! विषमता...

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Gaurav Bharti

कविताएँ: अक्टूबर 2020

किसी रोज़ किसी रोज़ हाँ, किसी रोज़ मैं वापस आऊँगा ज़रूर अपने मौसम के साथ तुम देखना मुझ पर खिले होंगे फूल उगी होंगी हरी पत्तियाँ लदे होंगे फल मैं सीखकर आऊँगा चिड़ियों की...
Asangghosh

‘अब मैं साँस ले रहा हूँ’ से कविताएँ

'अब मैं साँस ले रहा हूँ' से कविताएँ स्वानुभूति मैं लिखता हूँ आपबीती पर कविता जिसे पढ़ते ही तुम तपाक से कह देते हो कि कविता में कल्पनाओं को कवि ने...
Meena Kumari

चाँद तन्हा है, आसमाँ तन्हा

चाँद तन्हा है आसमाँ तन्हा दिल मिला है कहाँ-कहाँ तन्हा बुझ गई आस, छुप गया तारा थरथराता रहा धुआँ तन्हा ज़िन्दगी क्या इसी को कहते हैं जिस्म तन्हा है...
Bolna Hi Hai - Ravish Kumar

प्रेम की कोई जगह

रवीश कुमार की किताब 'बोलना ही है' से हर कोई इश्क़ में नहीं होता है और न हर किसी में इश्क़ करने का साहस होता...
Woman walking on street

माँ के हिस्से की आधी नींद

माँ भोर में उठती है कि माँ के उठने से भोर होती है ये हम कभी नहीं जान पाए बरामदे के घोंसले में बच्चों संग चहचहाती गौरैया माँ को...
Leaf, Autumn, Plant

अक्टूबर

यह अक्टूबर फिर से बीतने को है साल-दर-साल इस महीने के साथ तुम बीत जाती हो एक बार पूरा बीतकर भी फिर वहीं से शुरू हो जाता है...
Dagh Dehalvi

ले चला जान मेरी

ले चला जान मेरी रूठ के जाना तेरा ऐसे आने से तो बेहतर था न आना तेरा अपने दिल को भी बताऊँ न ठिकाना तेरा सब ने...
Woman doing home chores

एक इन्टरव्यू

मैंने बच्चे को नहलाती खाना पकाती कपड़े धोती औरत से पूछा— 'सुना तुमने पैंतीस साल हो गए देश को आज़ाद हुए?' उसने कहा 'अच्छा'... फिर 'पैंतीस साल' दोहराकर आँगन बुहारने लगी दफ़्तर जाती...
Kailash Gautam

कल से डोरे डाल रहा है

कल से डोरे डाल रहा है फागुन बीच सिवान में, रहना मुश्किल हो जाएगा प्यारे बंद मकान में। भीतर से खिड़कियाँ खुलेंगी बौर आम के महकेंगे, आँच पलाशों पर आएगी सुलगेंगे...
Suresh Jinagal

सुरेश जिनागल की कविताएँ: अक्टूबर 2020

ललेश्वरी बर्फ़ का सीना चीरकर उगे चिनार के नीचे बैठकर आग का कोई गीत गाती स्त्री सदियों की बर्फ़ को पिघला रही है उसकी ज़िद, उसका साहस...
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