Tag: Hindi Essay

Hazari Prasad Dwivedi

आपने मेरी रचना पढ़ी?

हमारे साहित्यिकों की भारी विशेषता यह है कि जिसे देखो वहीं गम्भीर बना है, गम्भीर तत्ववाद पर बहस कर रहा है और जो कुछ...
bhartendu harishchandra

भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है

'भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है' - भारतेंदु हरिश्चंद्रआज बड़े आनंद का दिन है कि छोटे से नगर बलिया में हम इतने मनुष्यों को...
Balkrishna Bhatt

पंच महाराज

'पंच महाराज' - बालकृष्ण भट्टमाथे पर तिलक, पाँव में बूट चपकन और पायजामा के एवज में कोट और पैंट पहने हुए पंच जी को...
Sumitranandan Pant

कविवर श्री सुमित्रानन्दन पन्त

'कविवर श्री सुमित्रानन्दन पन्त' - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'"मग्न बने रहते हैं मोद में विनोद में क्रीड़ा करते हैं कल कल्पना की गोद में, सारदा के मन्दिर...
Balkrishna Bhatt

जी

'जी' - बालकृष्ण भट्टसाधारण बातचीत में यह जी भी जी का जंजाल सा हो रहा है। अजी बात ही चीत क्‍या जहाँ और जिसमें...
samay - badri narayan chaudhary premghan

समय

'समय' - बद्रीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’काव्यशासस्त्र विनोदेन कालो गच्छति धीमताम। व्यसनेन च मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा॥यह विख्यात है कि त्रिभुवन में विजय की पताका फहराने वाला,...
Pratap Narayan Mishra

पेट

इन दो अक्षरों की महिमा भी यदि अपरंपार न कहिए तौ भी यह तो मानना ही पड़ेगा कि बहुत बड़ी है। जितने प्राणी और...
bhay - ramchandra shukla

भय

'भय' - रामचंद्र शुक्लकिसी आती हुई आपदा की भावना या दुःख के कारण के साक्षात्‍कार से जो एक प्रकार का आवेगपूर्ण अथवा स्‍तंभ-कारक मनोविकार...
Hazari Prasad Dwivedi

कुटज

'Kutaj', Hindi Nibandh by Hazari Prasad Dwivediकहते हैं, पर्वत शोभा-निकेतन होते हैं। फिर हिमालय का तो कहना ही क्‍या। पूर्व और अपार समुद्र -...
gehun aur gulaab - rambriksh benipuri

गेहूँ बनाम गुलाब

'गेहूँ बनाम गुलाब' - रामवृक्ष बेनीपुरीगेहूँ हम खाते हैं, गुलाब सूँघते हैं। एक से शरीर की पुष्टि होती है, दूसरे से मानस तृप्‍त होता...
Pratap Narayan Mishra

धोखा

"बेईमानी तथा नीतिकुशलता में इतना ही भेद है कि जाहिर हो जाए, तो बेईमानी कहलाती है और छिपी रहे, तो बुद्धिमानी है।"

स्त्री: दान ही नहीं, आदान भी

"जब तक स्त्री के सामने ऐसी समस्या नहीं आती, जिसमें उसे बिना कोई विशेष मार्ग स्वीकार किए जीवन असंभव दिखाई देने लगता है, तब तक वह अपनी मनुष्यता को जीवन की सबसे बहुमूल्य वस्तु के समान ही सुरक्षित रखती है। यही कारण है कि वह क्रूर-से-क्रूर, पतित-से-पतित पुरुष की मलिन छाया में भी अपने जीवन का गौरव पालती रहती है।"

STAY CONNECTED

38,332FansLike
19,561FollowersFollow
27,279FollowersFollow
1,590SubscribersSubscribe

RECENT POSTS

Jeete Jee Allahabad - Mamta Kalia

किताब अंश: ‘जीते जी इलाहाबाद’

'जीते जी इलाहाबाद' ममता कालिया की एक संस्‍मरणात्‍मक कृ‌ति है, जिसमें हमें अनेक उन लोगों के शब्दचित्र मिलते हैं जिनके बिना आधुनिक हिन्दी साहित्य...
Tumhari Kshay - Rahul Sankrityayan

राहुल सांकृत्यायन – ‘तुम्हारी क्षय’

राहुल सांकृत्यायन की किताब 'तुम्हारी क्षय' से उद्धरण | Quotes from 'Tumhari Kshya', a book by Rahul Sankrityayan चयन: पुनीत कुसुम   "उन्हीं के ख़ून से मोटी...
Rahul Sankrityayan

तुम्हारी जोंकों की क्षय

जोंकें? — जो अपनी परवरिश के लिए धरती पर मेहनत का सहारा नहीं लेतीं। वे दूसरों के अर्जित ख़ून पर गुज़र करती हैं। मानुषी...
Gaurav Bharti

कविताएँ: सितम्बर 2021

हादसा मेरे साथ प्रेम कम उसकी स्मृतियाँ ज़्यादा रहींप्रेम जिसका अन्त मुझ पर एक हादसे की तरह बीता मुझे उस हादसे पर भी प्रेम आता है। गंध मैं तुम्हें याद करता हूँ दुनिया...
Ravit Yadav

कुछ दूर चलते ही

घर में आख़िरी रात। समान लगाने की प्रक्रिया में भावनाओं को रोकना एक मुश्किल काम है। भावनाएँ जो इतने दिन दिल्ली में रहने से...
Leaves, Leaf, Difference, Different but same

व्याकरण

मेरे शरीर का व्याकरण अलग है सारे वाक्य तितर-बितर हैं पूर्ण-विराम असमय आ जाता है भूत वर्तमान भविष्य सब एक से है जहाँ संधि की ज़रूरत है वहाँ विच्छेद...
Ek Desh Barah Duniya - Shirish Khare

‘एक देश बारह दुनिया’ : हाशिए पर छूटे भारत की तस्वीर

पुस्तक: 'एक देश बारह दुनिया : हाशिए पर छूटे भारत की तस्वीर' लेखक: शिरीष खरे प्रकाशक: राजपाल एण्ड संससमीक्षा/टिप्पणी: आलोक कुमार मिश्रासंविधान में लिखा है— 'इंडिया...
Pramod Ranjan - Pankaj Pushkar

भाषायी असमानता को हमारे शिक्षण-संस्थान जन्म दे रहे हैं

'भाषायी असमानता को हमारे शिक्षण-संस्थान जन्म दे रहे हैं' : प्रमोद रंजन से पंकज पुष्कर की बातचीत पंकज पुष्कर: जन्म से लेकर अब तक आपकी...
Ek Bata Do - novel by Sujata

समीक्षा: ‘एक बटा दो’

किताब: 'एक बटा दो' लेखिका: सुजाता प्रकाशक: राजकमल प्रकाशनसमीक्षा/टिप्पणी: महेश कुमार स्त्री निर्मिति की विभिन्न चरणों की पड़ताल करके उससे बाहर निकलने का स्त्रीवादी विश्लेषण है 'एक...
Vijendra

कवि

मेरे लिए कविता रचने का कोई ख़ास क्षण नहीं। मैं कोई गौरय्या नहीं जो सूर्योदय और सूर्यास्त पर घौंसले के लिए चहचहाना शुरू कर दूँ।समय ही ऐसा है कि मैं...
कॉपी नहीं, शेयर करें! ;-)