Tag: Krishna Sobti

Mitro Marjani - Krishna Sobti

किताब अंश: ‘मित्रो मरजानी’ – कृष्णा सोबती

'मित्रो मरजानी' हिन्दी का एक ऐसा उपन्यास है जो अपने अनूठे कथा-शिल्प के कारण चर्चा में आया। इस उपन्यास को जीवन्त बनाने में 'मित्रो'...
Mitro Marjani - Krishna Sobti

कृष्णा सोबती – ‘मित्रो मरजानी’

कृष्णा सोबती के उपन्यास 'मित्रो मरजानी' से उद्धरण | Quotes from 'Mitro Marjani', a Hindi novel by Krishna Sobti   "इस देह से जितना जस-रस ले...
Krishna Sobti

दादी-अम्मा

"एकाएक करवट लेते-लेते दो-चार क़दम उठाए और दादा की चारपाई के पास आ खड़ी हुई। झुककर कई क्षण तक दादा की ओर देखती रही। दादा नींद में बेख़बर थे और दादी जैसे कोई पुरानी पहचान कर रही हो। खड़े-खड़े कितने पल बीत गए! क्या दादी ने दादा को पहचाना नहीं? चेहरा उसके पति का है पर दादी तो इस चेहरे को नहीं, चेहरे के नीचे पति को देखना चाहती है। उसे बिछुड़ गए वर्षों में से वापस लौटा लेना चाहती है।"

मेरी माँ कहाँ

दिन के बाद उसने चाँद-सितारे देखे हैं। अब तक वह कहाँ था? नीचे, नीचे, शायद बहुत नीचे... जहाँ की खाई इनसान के खून से...
Krishna Sobti

कृष्णा सोबती – ‘ज़िन्दगीनामा’

कृष्णा सोबती के उपन्यास 'ज़िन्दगीनामा' से उद्धरण | Quotes from 'Zindaginama' by Krishna Sobti   "बच्चों, जुग चार होते हैं: सोता हुआ कलजुग छोड़ता हुआ द्वापर खड़ा हुआ त्रेता...
sikka badal gaya krishna sobti

सिक्का बदल गया

जब सिक्का बदल गया, यानी सत्ता बदल गयी तो लोगों का देश, पिंड और समाज भी बदल गया। एक नयी वफादारी उन पर थोप दी गयी और जो कुछ भी उनका अपना था, सब छीन लिया गया। कृष्णा सोबती की यह कहानी बँटवारे और विस्थापन का दुर्भाग्य झेलते लोगों की वेदना और असहाय परिस्थितियों का चित्रण करती है और उनकी सर्वोच्च कहानियों में से एक है।

मौलवीजी, आपाँ चले! (ज़िन्दगीनामा से)

मौलवीजी ने फत्ते को बाहर झांकते देखा तो आवाज़ दे दी- "फत्तया, दर्रों के नाम गिना!" "खैबर, ख़ुर्रम, टोची, गोमल और जी रब्ब आपका भला करे, ईरान!" "ईरान कि 'बोलान'?" फत्ते को जाने की जल्दी थी सो लापरवाही से कहा- "अहो जी, कुछ भी हो हमारी तरफ से! अब छुट्टी कर दो! घर पहुँचते बनें। आसमान देखो। अंधेर घुप्प घेंर!"

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