Tag: marriage

Periyar

पति-पत्नी नहीं, बनें एक-दूसरे के साथी

'ई. वी. रामासामी पेरियार : दर्शन-चिंतन और सच्ची रामायण' से विवाहित दम्पतियों को एक-दूसरे के साथ मैत्री-भाव से व्यवहार करना चाहिए। किसी भी मामले में...
Amarkant

एक थी गौरा

लम्बे क़द और डबलंग चेहरे वाले चाचा रामशरण के लाख विरोध के बावजूद आशू का विवाह वहीं हुआ। उन्होंने तो बहुत पहले ही ऐलान...
Rajni Tilak

प्यार

सोचा था प्यार की दुनिया बड़ी हसीन होगी, 'उसके' साथ ज़िन्दगी रंगीन होगी, पाया एक अनुभव प्यार एक पदार्थ थकावट भरी नींद! विवाह की कल्पना थी मृदुल शान्त प्यार की छत अहसासों की दीवारें, परन्तु वह...
Tasneef

शादी: एक ग़ैर-ज़रूरी सोशल एग्रीमेंट

हालांकि मैं ये तहरीर लिखते वक़्त जानता हूँ कि मुझे भी कभी न कभी इस फन्दे में पाँव रखना पड़ सकता है और वो...
Ashok Chakradhar

मनोहर को विवाह-प्रेरणा

'Manohar Ko Vivah Prerna', a poem by Ashok Chakradhar रुक रुक ओ टेनिस के बल्ले, जीवन चलता नहीं इकल्ले! अरे अनाड़ी, चला रहा तू बहुत दिनों से बिना धुरी...
Kahlil Gibran

साथ होने के लिए हमेशा पास खड़े होने की ज़रूरत नहीं होती!

'The Prophet: Marriage' : : Kahlil Gibran अंग्रेज़ी से अनुवाद: गौरव अदीब और तब अलमित्रा ने दोबारा पूछा, "शादी के बारे में आप क्या कहेंगे?" उन्होंने जवाब...

मच्छर का ब्याह

मच्छर बोला- "ब्याह करूँगा मैं तो मक्खी रानी से" मक्खी बोली- "जा-जा पहले मुँह तो धो आ पानी से! ब्याह करूँगी मैं बेटे से धूमामल हलवाई के, जो दिन-रात मुझे...

STAY CONNECTED

32,392FansLike
11,518FollowersFollow
21,215FollowersFollow
667SubscribersSubscribe

Recent Posts

Gaurav Bharti

कविताएँ: अक्टूबर 2020

किसी रोज़ किसी रोज़ हाँ, किसी रोज़ मैं वापस आऊँगा ज़रूर अपने मौसम के साथ तुम देखना मुझ पर खिले होंगे फूल उगी होंगी हरी पत्तियाँ लदे होंगे फल मैं सीखकर आऊँगा चिड़ियों की...
Asangghosh

‘अब मैं साँस ले रहा हूँ’ से कविताएँ

'अब मैं साँस ले रहा हूँ' से कविताएँ स्वानुभूति मैं लिखता हूँ आपबीती पर कविता जिसे पढ़ते ही तुम तपाक से कह देते हो कि कविता में कल्पनाओं को कवि ने...
Meena Kumari

चाँद तन्हा है, आसमाँ तन्हा

चाँद तन्हा है आसमाँ तन्हा दिल मिला है कहाँ-कहाँ तन्हा बुझ गई आस, छुप गया तारा थरथराता रहा धुआँ तन्हा ज़िन्दगी क्या इसी को कहते हैं जिस्म तन्हा है...
Bolna Hi Hai - Ravish Kumar

प्रेम की कोई जगह

रवीश कुमार की किताब 'बोलना ही है' से हर कोई इश्क़ में नहीं होता है और न हर किसी में इश्क़ करने का साहस होता...
Woman walking on street

माँ के हिस्से की आधी नींद

माँ भोर में उठती है कि माँ के उठने से भोर होती है ये हम कभी नहीं जान पाए बरामदे के घोंसले में बच्चों संग चहचहाती गौरैया माँ को...
Leaf, Autumn, Plant

अक्टूबर

यह अक्टूबर फिर से बीतने को है साल-दर-साल इस महीने के साथ तुम बीत जाती हो एक बार पूरा बीतकर भी फिर वहीं से शुरू हो जाता है...
Dagh Dehalvi

ले चला जान मेरी

ले चला जान मेरी रूठ के जाना तेरा ऐसे आने से तो बेहतर था न आना तेरा अपने दिल को भी बताऊँ न ठिकाना तेरा सब ने...
Woman doing home chores

एक इन्टरव्यू

मैंने बच्चे को नहलाती खाना पकाती कपड़े धोती औरत से पूछा— 'सुना तुमने पैंतीस साल हो गए देश को आज़ाद हुए?' उसने कहा 'अच्छा'... फिर 'पैंतीस साल' दोहराकर आँगन बुहारने लगी दफ़्तर जाती...
Kailash Gautam

कल से डोरे डाल रहा है

कल से डोरे डाल रहा है फागुन बीच सिवान में, रहना मुश्किल हो जाएगा प्यारे बंद मकान में। भीतर से खिड़कियाँ खुलेंगी बौर आम के महकेंगे, आँच पलाशों पर आएगी सुलगेंगे...
Suresh Jinagal

सुरेश जिनागल की कविताएँ: अक्टूबर 2020

ललेश्वरी बर्फ़ का सीना चीरकर उगे चिनार के नीचे बैठकर आग का कोई गीत गाती स्त्री सदियों की बर्फ़ को पिघला रही है उसकी ज़िद, उसका साहस...
कॉपी नहीं, शेयर करें! ;-)