Tag: memories

Rahul Sankrityayan

स्‍मृतियाँ

घुमक्कड़ असंग और निर्लेप रहता है, यद्यपि मानव के प्रति उसके हृदय में अपार स्‍नेह है। यही अपार स्‍नेह उसके हृदय में अनंत प्रकार...
Rahi Masoom Raza

मैं इक फेरीवाला

मैं इक फेरीवाला बेचूँ यादें सस्ती-महँगी, सच्ची-झूठी, उजली-मैली, रंग-बिरंगी यादें होंठ के आँसू आँखों की मुस्कान, हरी फ़रियादें मैं इक फेरी वाला बेचूँ यादें! यादों के रंगीन ग़ुबारे नीले-पीले, लाल-गुलाबी रंग-बिरंगे धागों के...
Rose, Flower, Hand

स्मृतियाँ अब भी प्रतीक्षारत हैं

स्मृतियाँ चंदनवन की मलय में घुल स्वयं बन जाना चाहती थीं सुगंध, एहसासों की तरलता छिड़क हरा-भरा कर देना चाहती थीं चंदनवन का हर पीला पत्ता मलयतरु की फुनगी पर...
Holding Hands, Couple, Love, Together

साथ-साथ, जाड़े की एक शाम

साथ-साथ हमने साथ-साथ आँखें खोलीं, देखा बालकनी के उस पार उगते सूरज को, टहनी पर खिले अकेले गुलाब पर साथ-साथ ही पानी डाला, पीली पड़ चुकी पत्तियों को आहिस्ता से किया विलग, साथ-साथ देखी टीवी पर मिस्टर एण्ड मिसिज़...
Amrita Pritam

याद

आज सूरज ने कुछ घबराकर रोशनी की एक खिड़की खोली बादल की एक खिड़की बन्द की और अँधेरे की सीढ़ियाँ उतर गया आसमान की भवों पर...
Gaurav Bharti

कविताएँ : जुलाई 2020

माँ ने नहीं देखा है शहर गुज़रता है मोहल्ले से जब कभी कोई फेरीवाला हाँक लगाती है उसे मेरी माँ माँ ख़रीदती है रंग-बिरंगे फूलों की छपाई वाली चादर और...
Prabhat

‘जीवन के दिन’ से कविताएँ

कविता संग्रह: 'जीवन के दिन' - प्रभात चयन व प्रस्तुति: अमर दलपुरा याद मैं ज़मीन पर लेटा हुआ हूँ पर बबूल का पेड़ नहीं है यहाँ मुझे उसकी याद...
Nirmal Gupt

स्मृति का अस्तबल

'Smriti Ka Astbal', a poem by Nirmal Gupt स्मृति के अस्तबल में हिनहिना रहे हैं बीमार, अशक्त और उदास घोड़े अतीत की सुनहरी पन्नी में लिपटे इन घोड़ों...
Gaurow Gupta

स्मृतियों की जेल से एक क़ैदी का ख़त

मेरी उदासी में, तुम ऊष्मा थी ठिठुरती ज़िन्दगी की उम्मीद जिस पर मैं अपना मन सेंकता था... तुम्हारी मौजूदगी मेरे बहुत अकेलेपन को किसी जादू की तरह, कम अकेलेपन में...
Harshita Panchariya

स्मृतियाँ, आग

Poems: Harshita Panchariya स्मृतियाँ देह के संग्रहालय में स्मृतियाँ अभिशाप हैं और यह जानते हुए भी मैं स्मृतियों की शृंखला जोड़ने में लगी हूँ सम्भवतः 'जोड़ने की कोशिश' तुम्हें भुलाने की क़वायद में एकमात्र...
Harshita Panchariya

भ्रम

स्मृतियों में सहेजने के तौर पर दिए गए सभी चुम्बन पीड़ा में ऐसे भ्रम बनाए रखते हैं, मानो आँख खुलते ही ईश्वर सामने नज़र आ जाएगा। यूँ बंद आँखों के...
Doodhnath Singh

सारे काम निपटाकर तुम्हें याद करने बैठा

'Sare Kaam Niptakar Tumhein Yaad Karne Baitha', a poem by Doodhnath Singh सारे काम निपटाकर तुम्हें याद करने बैठा। फ़ुर्सत ही नहीं देते लोग तुम्हारे चेहरे पर...

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Gaurav Bharti

कविताएँ: अक्टूबर 2020

किसी रोज़ किसी रोज़ हाँ, किसी रोज़ मैं वापस आऊँगा ज़रूर अपने मौसम के साथ तुम देखना मुझ पर खिले होंगे फूल उगी होंगी हरी पत्तियाँ लदे होंगे फल मैं सीखकर आऊँगा चिड़ियों की...
Asangghosh

‘अब मैं साँस ले रहा हूँ’ से कविताएँ

'अब मैं साँस ले रहा हूँ' से कविताएँ स्वानुभूति मैं लिखता हूँ आपबीती पर कविता जिसे पढ़ते ही तुम तपाक से कह देते हो कि कविता में कल्पनाओं को कवि ने...
Meena Kumari

चाँद तन्हा है, आसमाँ तन्हा

चाँद तन्हा है आसमाँ तन्हा दिल मिला है कहाँ-कहाँ तन्हा बुझ गई आस, छुप गया तारा थरथराता रहा धुआँ तन्हा ज़िन्दगी क्या इसी को कहते हैं जिस्म तन्हा है...
Bolna Hi Hai - Ravish Kumar

प्रेम की कोई जगह

रवीश कुमार की किताब 'बोलना ही है' से हर कोई इश्क़ में नहीं होता है और न हर किसी में इश्क़ करने का साहस होता...
Woman walking on street

माँ के हिस्से की आधी नींद

माँ भोर में उठती है कि माँ के उठने से भोर होती है ये हम कभी नहीं जान पाए बरामदे के घोंसले में बच्चों संग चहचहाती गौरैया माँ को...
Leaf, Autumn, Plant

अक्टूबर

यह अक्टूबर फिर से बीतने को है साल-दर-साल इस महीने के साथ तुम बीत जाती हो एक बार पूरा बीतकर भी फिर वहीं से शुरू हो जाता है...
Dagh Dehalvi

ले चला जान मेरी

ले चला जान मेरी रूठ के जाना तेरा ऐसे आने से तो बेहतर था न आना तेरा अपने दिल को भी बताऊँ न ठिकाना तेरा सब ने...
Woman doing home chores

एक इन्टरव्यू

मैंने बच्चे को नहलाती खाना पकाती कपड़े धोती औरत से पूछा— 'सुना तुमने पैंतीस साल हो गए देश को आज़ाद हुए?' उसने कहा 'अच्छा'... फिर 'पैंतीस साल' दोहराकर आँगन बुहारने लगी दफ़्तर जाती...
Kailash Gautam

कल से डोरे डाल रहा है

कल से डोरे डाल रहा है फागुन बीच सिवान में, रहना मुश्किल हो जाएगा प्यारे बंद मकान में। भीतर से खिड़कियाँ खुलेंगी बौर आम के महकेंगे, आँच पलाशों पर आएगी सुलगेंगे...
Suresh Jinagal

सुरेश जिनागल की कविताएँ: अक्टूबर 2020

ललेश्वरी बर्फ़ का सीना चीरकर उगे चिनार के नीचे बैठकर आग का कोई गीत गाती स्त्री सदियों की बर्फ़ को पिघला रही है उसकी ज़िद, उसका साहस...
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