Tag: माँ

Vijay Rahi

शहर से गुज़रते हुए प्रेम, कविता पढ़ना, बेबसी

शहर से गुज़रते हुए प्रेम मैं जब-जब शहर से गुज़रता हूँ सोचता हूँ किसने बसाए होंगे शहर? शायद गाँवों से भागे प्रेमियों ने शहर बसाए होंगे ये वो अभागे थे, जो फिर लौटना...

माँ : छह कविताएँ

1 उसने बुना था पृथ्वी को तरह-तरह की ऋतुओं से मेरे लिए मखमली हरी घास बिछायी थी इन्द्रधनुष खिलाए थे उसे मालूम था मुझे सींचने वाले बहुत लोग नहीं हैं इसलिए उसने...
Habib Jalib

माँ

'Maa' - Habib Jalib बच्चों पे चली गोली माँ देख के ये बोली- ये दिल के मेरे टुकड़े यूँ रोएँ मेरे होते मैं दूर खड़ी देखूँ ये मुझसे नहीं होगा मैं दूर खड़ी...
Nirmal Gupt

माँ को याद करते हुए

'Maa Ko Yaad Karte Hue', a poem by Nirmal Gupt उस रात अँधेरा बहुत घना था मौसम ज़रा गुनगुना माँ ने अपने सर्द हाथों में थाम मेरे हाथ...
Vivek Chaturvedi

विवेक चतुर्वेदी की कविताएँ

Poems: Vivek Chaturvedi उस दिन भी... नहीं रहेंगे हम एक दिन धरती पर उस दिन भी खिले हमारे हिस्से की धूप और गुनगुना जाए देहरी पर चिड़िया आए उस दिन भी और हाथ...
Prem Shankar Raghuvanshi

मिल-बाँटकर

घर से चलते वक़्त पोटली में गुड़, सत्तू, चबैना रख दिया था माँ ने और जाने क्या-क्या, ठसाठस रेलगाड़ी में देर तक खड़े-खड़े भूख लगने लगी तो पोटली खोली जिसके...

माँ का चेहरा

'Maa Ka Chehra', a poem by Anupama Mishra आँखें उसकी और बड़ी हो गईं जब देखा रंग-बिरंगा लहँगा, किनारों पर जिसके लगे हुए थे सुर्ख़ सुनहले रंग के...
Nida Fazli

बेसन की सौंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी माँ

'Besan Ki Saundhi Roti', poetry by Nida Fazli बेसन की सौंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी माँ याद आती है चौका बासन चिमटा फुकनी जैसी माँ बाँस...
Woman

मीना पाण्डेय की कविताएँ

Poems: Meena Pandey सबसे अच्छी कविता सबसे अच्छी कविता उतर रही थी जब मुझे धूप में बोयाम सरकाना था, छत से उतार लाने थे ज़िम्मेदारियों के कपड़े सारा...
Mother Child

सुनो माँ

'Suno Maa', poems by Raginee Srivastava 1 सुनो माँ! धीरे-धीरे सीख रही हूँ जल्दी-जल्दी सब कुछ करना। अलसाई नींद, अल्हड़ हँसी और लापरवाह आदतों को मायके के संदूक में बंद कर आयी...
Parveen Shakir

जुदाई की पहली रात

'Judai Ki Pehli Raat', a nazm by Parveen Shakir आँख बोझल है मगर नींद नहीं आती है मेरी गर्दन में हमाइल तिरी बाँहें जो नहीं किसी करवट भी...
Leopold Staff

लियोपोल्ड स्टाफ की कविताएँ

Poems by Leopold Staff, a Polish poet अनुवाद: आदर्श भूषण क्या तुम? तुम मुझे बुलबुल, गुलाबों और चाँद की प्रशंसा करने से मना करते हो, ये शायद लगते हों...

STAY CONNECTED

26,708FansLike
5,944FollowersFollow
12,888FollowersFollow
240SubscribersSubscribe

MORE READS

कॉपी नहीं, शेयर करें! ;-)