Tag: patriarchy

Woman, Painted Face, Angry

बातचीत: ‘मिसॉजिनि क्या है?’

पढ़िए तसनीफ़ और शिवा की मिसॉजिनि (Misogyny (शाब्दिक अर्थ: स्त्री द्वेष)) पर एक विस्तृत बातचीत। तसनीफ़ उर्दू शायरी करते रहे हैं, उन्होंने एक नॉविल...
Usha Dashora

पितृसत्ता, तुम्हारी रीढ़ कौन है

आसमान के घर से एक बड़ा-सा पत्थर मोहल्ले के बीचों-बीच गिरा देखते ही देखते वह शीर्ष मंच पर आसीन हो गया औरतें जो साहसी सड़कें बनकर चल...
Sara Shagufta

औरत और नमक

इज़्ज़त की बहुत-सी क़िस्में हैं घूँघट, थप्पड़, गन्दुम इज़्ज़त के ताबूत में क़ैद की मेख़ें ठोंकी गई हैं घर से लेकर फ़ुटपाथ तक हमारा नहीं इज़्ज़त हमारे गुज़ारे...
Woman, Window, Bus, Train

स्त्री और पुरुष

स्त्री को पुरुष की दृष्टि से देखने की यह दीर्घकालिक परम्परा जो कि प्रारम्भ हुई तुम्हारे अगणित पितामहों के द्वारा, आज भी विस्तार पा रही तुम्हारे ही सदृश अनेक योग्य,...
Father Daughter, Girl, Kid

मुहर-भर रहे पिता

उन लड़कियों ने जाना पिता को एक अडिग आदेश-सा, एक मुहर-भर रहे पिता बेटियों के दस्तावेज़ों पर। कहाँ जाना, क्या खाना, क्या पढ़ना, निर्धारित कर, पिता ने निभायीं ज़िम्मेदारियाँ अपनी, बहरे रहे...
Pallavi Vinod

ये डायनें

पितृसत्ता को पोषित करती औरतों ने जाना ही नहीं कि उनके शब्दकोष में 'बहनापा' जैसा भी कोई शब्द है जिसे विस्तार देना चाहिए छठ, जियुतिया करती माँएँ हर बेटी...
Sadness, Grief, Painting, Woman

आख़िर स्त्रियों को कितना सहना चाहिए

'Aakhir Striyon Ko Kitna Sehna Chahiye', a poem by Rupam Mishra एक दिन मैं बारी-बारी से उन सारी जीवट और कर्मठ स्त्रियों पर कविता लिखूँगी जो एकदम नमक...
Woman behind a leaf

तुम स्त्री हो

'Tum Stree Ho', a poem by Mahima Shree सावधान रहो, सतर्क रहो किससे? कब? कहाँ? हमेशा रहो! हरदम रहो! जागते हुए भी, सोते हुए भी। क्या कहा! ख़्वाब देखती हो? उड़ना चाहती...
Woman in ghoonghat

पितृसत्ता की बेड़ियों में जकड़ी स्त्रियाँ

'Pitrasatta Ki Bediyon Mein Jakdi Striyaan', a poem by Anupama Vindhyavasini पितृसत्ता की बेड़ियों में जकड़ी स्त्रियाँ रोज़ सुबह बुहार देती हैं अपनी समस्त इच्छाएँ और फेंक देती हैं स्वप्नों...
Rahul Boyal

पौरुष

'Paurush', Hindi Kavita by Rahul Boyal मयूख होकर फूट पड़ेंगी प्रज्वलित मार्तण्ड से मेरी संवेदनायें, मुझको कर देंगी भस्म देखना तुम यूँ ही छिपे रहना अपने पौरुषीय...
Om Purohit Kagad

सन्नाटों में स्त्री

'Sannaton Mein Stree', a poem by Om Purohit Kagad दिन भर आँखों से ओझल रही मासूम स्त्री को रात के सन्नाटों में क्यों करते हैं याद ऐ दम्भी पुरुष! दिन में खेलते...
Om Purohit Kagad

वह लड़की

'Wah Ladki', a poem by Om Purohit 'Kagad' सामने के झोपड़े में रहने वाली वह लड़की अब सपने नहीं देखती। वह जानती है कि सपने में भी पुरुष की सत्ता...

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Anurag Tiwari

विदा

'अभी जिया नहीं' से विदा का शब्दों से निकलकर जब स्मृतियों में अस्तित्व हो जाता है दूर होना किसी किताब का बेमानी शब्द-सा रह जाता है किसी का...
Malala Yousafzai

संयुक्त राष्ट्र में दिया मलाला का भाषण

'मलाला हूँ मैं' से संयुक्त राष्ट्र ने जुलाई 12 का दिन ‘मलाला दिवस’ घोषित किया है। 12 जुलाई, 2013 को अपने 16वें जन्मदिवस पर मलाला...
Viren Dangwal

इतने भले नहीं बन जाना

इतने भले नहीं बन जाना साथी जितने भले हुआ करते हैं सरकस के हाथी गदहा बनने में लगा दी अपनी सारी क़ुव्वत, सारी प्रतिभा किसी से कुछ लिया...
Dharmasthal - Priyamvad

प्रियम्वद – ‘धर्मस्थल’

प्रियम्वद की किताब 'धर्मस्थल' से उद्धरण | Hindi Quotes by 'Dharmasthal', a book by Priyamvad संकलन: विजय शर्मा   "रचना के संसार में जब तुम कुछ नया...
Bhagat Singh

युवक!

आचार्य शिवपूजन सहाय की डायरी के अंश, 23 मार्च, पृष्ठ 28 सन्ध्या समय सम्मेलन भवन के रंगमंच पर देशभक्त भगत सिंह की स्मृति में सभा...
Rajni Tilak

मीठी अनुभूतियों को

हमने मधुर स्मृतियों और मीठी अनुभूतियों को इन कठोर हाथों से, तुम्हारे लिए हृदय से खींच बिखेरा है हमारे लहू के एक-एक क़तरे ने तुम्हारे खेत की बंजर भूमि...
Vijay Sharma

घोष बाबू और उनकी माँ

"हम यहाँ से निकलकर कहाँ जाएँगे?" — शिल्पा ने अनिमेष के कंधे पर सिर रक्खे कहा। "जहाँ क़िस्मत ले जाए!" — अनिमेष की आवाज़ में...
Ahmad Faraz

ले उड़ा फिर कोई ख़याल हमें

ले उड़ा फिर कोई ख़याल हमें साक़िया साक़िया सम्भाल हमें रो रहे हैं कि एक आदत है वर्ना इतना नहीं मलाल हमें ख़ल्वती हैं तेरे जमाल के हम आइने...
Ghumakkad Shastra

राहुल सांकृत्यायन – ‘घुमक्कड़ शास्त्र’

राहुल सांकृत्यायन की किताब 'घुमक्कड़ शास्त्र' से उद्धरण | Quotes from Ghumakkad Shastra, a book by Rahul Sankrityayan चयन: पुनीत कुसुम "वैसे तो गीता को बहुत...
Rahul Sankrityayan

स्‍मृतियाँ

घुमक्कड़ असंग और निर्लेप रहता है, यद्यपि मानव के प्रति उसके हृदय में अपार स्‍नेह है। यही अपार स्‍नेह उसके हृदय में अनंत प्रकार...
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