Tag: Purnima Maurya

Dark, Face, Girl, Woman, Sad

ख़तरनाक दुःख

मेरा दुःख नितान्त मेरा था जो कुछ-कुछ मेरी माँ या उनके जैसी तमाम औरतों के दुःख-सा ग़ैर-ज़रूरी मगर ख़तरनाक घोषित था जिन्हें घर-गृहस्थी में फँस, न जीने की फ़ुर्सत थी न मरने की।जिनके...
Fist, Protest, Dissent

आज़ाद कवि

अपराधी-सा जब उन्हें पकड़ा गया वो हमेशा की तरह अपने कामों में व्यस्त थे, लहूलुहान जंगल और नदी के ज़ख़्मों पर मलहम लगा फूलों को सुरक्षित करने के...

साबुतपन

पुरुष की नज़र में नमक होती है स्त्री बिना जिसके बेज़ायका ज़िन्दगी, करता है इस्तेमाल स्वादानुसार न ज़्यादा, न कम हरदम।वह नयी-नयी चीज़ों में रमाता है मन बदलता है स्वाद ख़ुश होता है ख़ामख़ा अहसास से पर...
Girl, Woman, Village

समन्दर

स्त्री सिर्फ़ नमक नहीं कि मनमाफ़िक इस्तेमाल कर बन्द कर डिब्बे में सजा दी जाए रसोई के किसी कोने में खाने की किसी टेबल पर।वह लहराता समन्दर है असीम सम्भावनाओं का पनपते हैं जहाँ अनमोल...
Woman

नियम, प्रश्न बिद्ध, सीटी

नियम पिंजरे में बन्द मैना घर की औरतों से गाती-बतियाती फुदकती उड़ते पंछियों को देख पंख फड़फड़ाती खा लेती, जो मिल जाता।आग नज़रों के नीचे रौबदार मूँछे देख वह पिंजरे में भी फुदकती न थी सतर्कता...
Woman

पूर्णिमा मौर्या की कविताएँ

बेल दूँ जब भी बनाती हूँ लोई और बेलती हूँ रोटी तो मन होता है दुनिया की सारी गोल मोल चीजें बेल दूँ।बेल दूँ धरती बेल दूँ सूरज बेल दूँ व्यवस्था बेल...
Cupboard

बाबा की अलमारी

रहस्यमयी लगती थी हम बहनों को हरे रंग की बाबा की छोटी अलमारी, मुरचाई मैली-सी फिर भी लगती हमको प्यारी।यूँ तो घर के हर कोने में होती अपनी आवाजाही पर उसको छूने...

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Jeete Jee Allahabad - Mamta Kalia

किताब अंश: ‘जीते जी इलाहाबाद’

'जीते जी इलाहाबाद' ममता कालिया की एक संस्‍मरणात्‍मक कृ‌ति है, जिसमें हमें अनेक उन लोगों के शब्दचित्र मिलते हैं जिनके बिना आधुनिक हिन्दी साहित्य...
Tumhari Kshay - Rahul Sankrityayan

राहुल सांकृत्यायन – ‘तुम्हारी क्षय’

राहुल सांकृत्यायन की किताब 'तुम्हारी क्षय' से उद्धरण | Quotes from 'Tumhari Kshya', a book by Rahul Sankrityayan चयन: पुनीत कुसुम   "उन्हीं के ख़ून से मोटी...
Rahul Sankrityayan

तुम्हारी जोंकों की क्षय

जोंकें? — जो अपनी परवरिश के लिए धरती पर मेहनत का सहारा नहीं लेतीं। वे दूसरों के अर्जित ख़ून पर गुज़र करती हैं। मानुषी...
Gaurav Bharti

कविताएँ: सितम्बर 2021

हादसा मेरे साथ प्रेम कम उसकी स्मृतियाँ ज़्यादा रहींप्रेम जिसका अन्त मुझ पर एक हादसे की तरह बीता मुझे उस हादसे पर भी प्रेम आता है। गंध मैं तुम्हें याद करता हूँ दुनिया...
Ravit Yadav

कुछ दूर चलते ही

घर में आख़िरी रात। समान लगाने की प्रक्रिया में भावनाओं को रोकना एक मुश्किल काम है। भावनाएँ जो इतने दिन दिल्ली में रहने से...
Leaves, Leaf, Difference, Different but same

व्याकरण

मेरे शरीर का व्याकरण अलग है सारे वाक्य तितर-बितर हैं पूर्ण-विराम असमय आ जाता है भूत वर्तमान भविष्य सब एक से है जहाँ संधि की ज़रूरत है वहाँ विच्छेद...
Ek Desh Barah Duniya - Shirish Khare

‘एक देश बारह दुनिया’ : हाशिए पर छूटे भारत की तस्वीर

पुस्तक: 'एक देश बारह दुनिया : हाशिए पर छूटे भारत की तस्वीर' लेखक: शिरीष खरे प्रकाशक: राजपाल एण्ड संससमीक्षा/टिप्पणी: आलोक कुमार मिश्रासंविधान में लिखा है— 'इंडिया...
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'भाषायी असमानता को हमारे शिक्षण-संस्थान जन्म दे रहे हैं' : प्रमोद रंजन से पंकज पुष्कर की बातचीत पंकज पुष्कर: जन्म से लेकर अब तक आपकी...
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समीक्षा: ‘एक बटा दो’

किताब: 'एक बटा दो' लेखिका: सुजाता प्रकाशक: राजकमल प्रकाशनसमीक्षा/टिप्पणी: महेश कुमार स्त्री निर्मिति की विभिन्न चरणों की पड़ताल करके उससे बाहर निकलने का स्त्रीवादी विश्लेषण है 'एक...
Vijendra

कवि

मेरे लिए कविता रचने का कोई ख़ास क्षण नहीं। मैं कोई गौरय्या नहीं जो सूर्योदय और सूर्यास्त पर घौंसले के लिए चहचहाना शुरू कर दूँ।समय ही ऐसा है कि मैं...
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