Tag: Rajkamal Choudhary

Rajkamal Chaudhary

रिक्शे पर एक सौ रातें

गरदन के नीचे से खींच लिया हाथ। बोली—अंधकार हयनि (नहीं हुआ है)! सड़कों पर अब तक घर-वापसी का जुलूस। दफ़्तर, दुकानें, अख़बार अब तक सड़कों पर। किसी मन्दिर के...
Rajkamal Chaudhary

बन्द कमरे में क़ब्रगाह

आदमी कुछ कहना चाहता है मगर एक ऐसा क्षण भी आता है जब उसकी आवाज़ सीने में दबी रह जाती है और वह कह...
Rajkamal Chaudhary

इस अकाल बेला में

होश की तीसरी दहलीज़ थी वो हाँ! तीसरी ही तो थी, जब तुम्हारी मुक्ति का प्रसंग कुलबुलाया था पहली बार मेरे भीतर अपनी तमाम तिलमिलाहट लिए दहकते लावे सा पैवस्त होता...
Rajkamal Chaudhary

तुम मुझे क्षमा करो

'Tum Mujhe Kshama Karo', a poem by Rajkamal Choudhary बहुत अँधी थीं मेरी प्रार्थनाएँ। मुस्कुराहटें मेरी विवश किसी भी चन्द्रमा के चतुर्दिक उगा नहीं पायी आकाश-गंगा लगातार फूल... चन्द्रमुखी! बहुत अँधी थीं मेरी प्रार्थनाएँ। मुस्कुराहटें मेरी...
Dhoomil

राजकमल चौधरी

सोहर की पंक्तियों का रस (चमड़े की निर्जनता को गीला करने के लिए) नये सिरे से सोखने लगती हैं जाँघों में बढ़ती हुई लालचे से भविष्य के रंगीन...
Rajkamal Chaudhary

ड्राइंगरूम

"जूड़ा बांधने की क्रिया के वक्त मेरी आंखें उसकी बांहों से चिपकी रहीं, और मैं आतंकित होता रहा। आतंकित इसलिए होता रहा कि उसका शरीर अपने-आप में शारीरिक आभिजात्य का सुंदरतम उदाहरण था और पता नहीं मेरा स्वभाव ऐसा क्यों है कि मैं नारी शरीर से और आभिजात्य से यों ही आतंकित होता रहा हूँ।"
Rajkamal Chaudhary

जलते हुए मकान में कुछ लोग

"तुम जरा भी शर्म मत करो। समझ लो, अँधेरे में हर औरत हर मर्द की बीवी होती है। अँधेरे में शर्म मिट जाती है। रंग, धर्म, जात-बिरादरी, मोहब्बत, ईमान, अँधेरे में सब कुछ मिट जाता है। सिर्फ कमर के नीचे बैठी हुई औरत याद रहती है।"

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