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Pallavi Mukherjee

कविताएँ: जुलाई 2021

लौट आओ तुम तुम रहती थीं आकाश में बादलों के बीच तारों के संग चाँद के भीतर खुली धूप में हरी घास में फूलों में झरते हरसिंगार में गौरैयों की आवाज़ में कोयल की मीठी...
Sleep, Death

मृत्यु, नहीं आते सपने इन दिनों, लौटना

मृत्यु नहीं आना चाहिए उसे जिस तरह वह आयी है उस तरह जीवन की अनुपस्थिति में निश्चित है आना उसका, पर इस अनिश्चित ढलते समय में वह आयी है आतातायी...
Gaurav Bharti

कविताएँ: अक्टूबर 2020

किसी रोज़ किसी रोज़ हाँ, किसी रोज़ मैं वापस आऊँगा ज़रूर अपने मौसम के साथतुम देखना मुझ पर खिले होंगे फूल उगी होंगी हरी पत्तियाँ लदे होंगे फलमैं सीखकर आऊँगा चिड़ियों की...
Kunwar Narayan

अबकी अगर लौटा तो

अबकी अगर लौटा तो बृहत्तर लौटूँगा चेहरे पर लगाए नोकदार मूँछें नहीं कमर में बाँधे लोहे की पूँछें नहीं जगह दूँगा साथ चल रहे लोगों को तरेरकर न देखूँगा...
Amar Dalpura

कविताएँ: अक्टूबर 2020

1इन घरों में घास क्यों उगी है कौन रहता था यहाँ काठ पर ताला किसकी इच्छा से लगाया है इस आँगन को लीपने वाली स्त्री और उसका आदमी कहाँ...
Hands. Separation

कभी न लौटने के लिए मत जाना

सुनो! जब जाना तो इस तरह मत जाना कि कभी लौट न सको उन्हीं रास्तों पर वापस जाते हुए गिराते जाना रास्ते में ख़त का पुर्ज़ा, कोई...
Meena Keshwar Kamal

मैं कभी पीछे नहीं लौटूँगी

मैं वह औरत हूँ जो जाग उठी है अपने भस्‍म कर दिए गए बच्‍चों की राख से मैं उठ खड़ी हुई हूँ और बन गयी हूँ एक...
Rituraj

लौटना

जीवन के अन्तिम दशक में कोई क्यों नहीं लौटना चाहेगा परिचित लोगों की परिचित धरती परनिराशा और थकान ने कहा— जो कुछ इस समय सहजता से उपलब्ध है उसे...
Rajkamal Chaudhary

अनायास

फिर भी कभी चला जाऊँगा उसी दरवाज़े तक अनायास जैसे, उस अँधियारे गलियारे में कोई अब तक रहता हो। फिर भी, दीवार की कील पर अटका...
Rag Ranjan

मैं जहाँ कहीं से लौटा

मैंने कभी फूल नहीं तोड़े, जब भी उन्हें छुआ अपनी उंगलियों के पोरों पर एक सतर्क कृतज्ञता महसूस कीमैंने किताबों में निशानदेही नहीं की कभी नहीं मोड़ा कोई...
Kailash Gautam

काली-काली घटा देखकर

काली-काली घटा देखकर जी ललचाता है, लौट चलो घर पंछी जोड़ा ताल बुलाता है।सोंधी-सोंधी गंध खेत की हवा बाँटती है, सीधी-सादी राह बीच से नदी काटती है, गहराता है रंग और मौसम लहराता है।लौट...
Rohit Thakur

हम सब लौट रहे हैं

हम सब लौट रहे हैं ख़ाली हाथ भय और दुःख के साथ लौट रहे हैं हमारे दिलो-दिमाग़ में गहरे भाव हैं पराजय के इत्मीनान से आते समय अपने कमरे को भी...

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Abstract, Time

चींटी और मास्क वाले चेहरे

स्वप्न में दिखती है एक चींटी और मास्क वाले चेहरे चींटी रेंगती है पृथ्वी की नाल के भीतर मास्क वाले चेहरे घूमते हैं भीड़ मेंसर से...
Abstract, Woman

जीवन सपना था, प्रेम का मौन

जीवन सपना था आँखें सपनों में रहीं और सपने झाँकते रहे आँखों की कोर से यूँ रची हमने अपनी दुनिया जैसे बचपन की याद की गईं कविताएँ हमारा दुहराया...
Kedarnath Singh

फ़र्क़ नहीं पड़ता

हर बार लौटकर जब अन्दर प्रवेश करता हूँ मेरा घर चौंककर कहता है 'बधाई'ईश्वर यह कैसा चमत्कार है मैं कहीं भी जाऊँ फिर लौट आता हूँसड़कों पर परिचय-पत्र माँगा...
Naveen Sagar

वह मेरे बिना साथ है

वह उदासी में अपनी उदासी छिपाए है फ़ासला सर झुकाए मेरे और उसके बीच चल रहा हैउसका चेहरा ऐंठी हुई हँसी के जड़वत् आकार में दरका है उसकी आँखें बाहर...
Nurit Zarchi

नूइत ज़ारकी की कविता ‘विचित्रता’

नूइत ज़ारकी इज़राइली कवयित्री हैं जो विभिन्न साहित्य-सम्बन्धी पुरस्कारों से सम्मानित हैं। प्रस्तुत कविता उनकी हीब्रू कविता के तैल गोल्डफ़ाइन द्वारा किए गए अंग्रेज़ी...
Sunset

कितने प्रस्थान

सूरज अधूरी आत्महत्या में उड़ेल आया दिन-भर का चढ़ना उतरते हुए दृश्य को सूर्यास्त कह देना कितना तर्कसंगत है यह संदेहयुक्त है अस्त होने की परिभाषा में कितना अस्त हो जाना दोबारा...
Naresh Mehta

कवच

मैं जानता हूँ तुम्हारा यह डर जो कि स्वाभाविक ही है, कि अगर तुम घर के बाहर पैर निकालोगे तो कहीं वैराट्य का सामना न हो जाए, तुम्हें...
Vishesh Chandra Naman

मैं

मैं एक तीर था जिसे सबने अपने तरकश में शामिल किया किसी ने चलाया नहींमैं एक फूल था टूटने को बेताब सबने मुझे देखा, मेरे रंगों की तारीफ़ की और मैं...
Gaurav Bharti

कविताएँ: नवम्बर 2021

यात्री भ्रम कितना ख़ूबसूरत हो सकता है? इसका एक ही जवाब है मेरे पास कि तुम्हारे होने के भ्रम ने मुझे ज़िन्दा रखातुम्हारे होने के भ्रम में मैंने शहर...
God, Abstract Human

कौन ईश्वर

नहीं है तुम्हारी देह में यह रुधिर जिसके वर्ण में अब ढल रही है दिवा और अँधेरा सालता हैरोज़ थोड़ी मर रही आबादियों में रोज़ थोड़ी बढ़ रही...
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