Tag: Sexuality

Rajendra Yadav

प्रतीक्षा

बहुत बार एक ही अवस्था से गुज़र चुकने पर लोग उसके अभ्यस्त हो जाते हैं। लेकिन गीता के साथ ऐसा नहीं है, और प्रतीक्षा...
Ek Ladki Ko Dekha Toh Aisa Laga

एक लड़की को देखा तो कैसा लगा?

दो लोग एक दूसरे के प्यार में पड़ते हैं, इस राह में उनके सामने कुछ कठिनाइयाँ आती हैं, मगर आखिरकार वे उन कठिनाइयों को...
Fingers, Hands, Love, Couple

समलैंगिक

'Samlaingik', a poem by Puneet Kusum जब भी सोचा अपनी किसी कविता में तुम्हें लिखूँ तुम्हारी और मेरी भिन्नता क़लम और काग़ज़ के बीच एक बाधा बन खड़ी रही कोई भी...
lihaaf - ismat chughtai

लिहाफ

जब मैं जाड़ों में लिहाफ ओढ़ती हूँ तो पास की दीवार पर उसकी परछाई हाथी की तरह झूमती हुई मालूम होती है। और एकदम...

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Recent Posts

Naveen Sagar

बचते-बचते थक गया

दिन-रात लोग मारे जाते हैं दिन-रात बचता हूँ बचते-बचते थक गया हूँ न मार सकता हूँ न किसी लिए भी मर सकता हूँ विकल्‍प नहीं हूँ दौर का कचरा हूँ हत्‍या...
Paash

आधी रात में

आधी रात में मेरी कँपकँपी सात रज़ाइयों में भी न रुकी सतलुज मेरे बिस्तर पर उतर आया सातों रज़ाइयाँ गीली बुख़ार एक सौ छह, एक सौ सात हर साँस पसीना-पसीना युग...
Giving Flower, Love, Joy, Happiness, Flower

सुन्दर बातें

जब हम मिले थे वह समय भी अजीब था शहर में दंगा था कोई कहीं आ-जा नहीं सकता था एक-दूसरे को वर्षों से जानने वाले लोग एक-दूसरे को अब...
Kedarnath Agarwal

प्रश्न

मोड़ोगे मन या सावन के घन मोड़ोगे? मोड़ोगे तन या शासन के फन मोड़ोगे? बोलो साथी! क्या मोड़ोगे? तोड़ोगे तृण या धीरज धारण तोड़ोगे? तोड़ोगे प्रण या भीषण शोषण तोड़ोगे? बोलो साथी! क्या...
Rajesh Joshi

पृथ्वी का चक्कर

यह पृथ्वी सुबह के उजाले पर टिकी है और रात के अंधेरे पर यह चिड़ियों के चहचहाने की नोक पर टिकी है और तारों की झिलमिल लोरी पर तितलियाँ...
Harivansh Rai Bachchan

कवि के मुख से : मधुशाला

ऑल इण्डिया रेडियो, लखनऊ, से प्रसारित, 1941 मेरी सबसे पहली रचना 'तेरा हार' 1932 में प्रकाशित हुई थी। उसकी प्रशंसा मैंने पत्रों में पढ़ी थी...
Dictatorship

सुनो तानाशाह!

सुनो तानाशाह! एक दिन चला जाऊँगा एक नियत दिन जो कई वर्षों से मेरी प्रतीक्षा में बैठा है मेरी जिजीविषा का एक दिन जिसका मुझे इल्म तक नहीं है— क्या...
Bhagat Singh

सत्याग्रह और हड़तालें

'भगत सिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़' से जून, 1928 'किरती' में इन दो विषयों पर टिप्पणियाँ छपीं। भगतसिंह 'किरती' के सम्पादक मण्डल...
Mahadevi Verma

नारीत्व का अभिशाप

'शृंखला की कड़ियाँ' से चाहे हिन्दू नारी की गौरव-गाथा से आकाश गूँज रहा हो, चाहे उसके पतन से पाताल काँप उठा हो परन्तु उसके लिए...
Sheen Kaaf Nizam

कभी जंगल, कभी सहरा, कभी दरिया लिख्खा

कभी जंगल, कभी सहरा, कभी दरिया लिख्खा अब कहाँ याद कि हम ने तुझे क्या-क्या लिख्खा शहर भी लिक्खा, मकाँ लिक्खा, मोहल्ला लिखा हम कहाँ के थे...
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