Tag: Solitude

Cobweb

जाल

मकड़ी के जालों से ज़ियादा प्रभावित किसी और चीज़ से नहीं हुआ मैं। हर बार उसे झाड़ू से या झालर से झाड़कर हटा दिया...
Night, Lonely, Alone, Road

एकान्त के स्पर्श

दूर से आती आवाज़, जिसके स्वर स्पष्ट नहीं, बस एक गूँज है—हवा में तैरती हुई। लगता है जिस हवा पर यह सवार हो आती है, उसी पर लौट...
Couple, Love, Waves, Abstract

जब कोई क्षण टूटता

वह मेरी सर्वत्रता था मैं उसका एकान्त— इस तरह हम कहीं भी अन्यत्र नहीं थे।जब कोई क्षण टूटता वहाँ होता एक अनन्तकालीन बोध उसके समयान्तर होने का मुझमें।जब कोई क्षण टूटता तब मेरा एकान्त आकाश नहीं एक छोटा-सा...
D H Lawrence

डी. एच. लॉरेंस की कविता ‘उखड़े हुए लोग’

अनुवाद: रामधारी सिंह 'दिनकर'अकेलेपन से जो लोग दुःखी हैं, वृत्तियाँ उनकी निश्चय ही, बहिर्मुखी हैं।सृष्टि से बाँधने वाला तार उनका टूट गया है; असली आनन्द का आधार छूट गया है।उद्गम...
Man, Abstract

सुबह, धुआँ, एकान्त के स्पर्श

सुबह रात भर ओस में डूबी डाल पर बैठकर चिड़िया कुछ कहकर गई है। सूर्य के ललाट से उठती किरणें धरती का तन छूती हैं और...

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Abstract, Time

चींटी और मास्क वाले चेहरे

स्वप्न में दिखती है एक चींटी और मास्क वाले चेहरे चींटी रेंगती है पृथ्वी की नाल के भीतर मास्क वाले चेहरे घूमते हैं भीड़ मेंसर से...
Abstract, Woman

जीवन सपना था, प्रेम का मौन

जीवन सपना था आँखें सपनों में रहीं और सपने झाँकते रहे आँखों की कोर से यूँ रची हमने अपनी दुनिया जैसे बचपन की याद की गईं कविताएँ हमारा दुहराया...
Kedarnath Singh

फ़र्क़ नहीं पड़ता

हर बार लौटकर जब अन्दर प्रवेश करता हूँ मेरा घर चौंककर कहता है 'बधाई'ईश्वर यह कैसा चमत्कार है मैं कहीं भी जाऊँ फिर लौट आता हूँसड़कों पर परिचय-पत्र माँगा...
Naveen Sagar

वह मेरे बिना साथ है

वह उदासी में अपनी उदासी छिपाए है फ़ासला सर झुकाए मेरे और उसके बीच चल रहा हैउसका चेहरा ऐंठी हुई हँसी के जड़वत् आकार में दरका है उसकी आँखें बाहर...
Nurit Zarchi

नूइत ज़ारकी की कविता ‘विचित्रता’

नूइत ज़ारकी इज़राइली कवयित्री हैं जो विभिन्न साहित्य-सम्बन्धी पुरस्कारों से सम्मानित हैं। प्रस्तुत कविता उनकी हीब्रू कविता के तैल गोल्डफ़ाइन द्वारा किए गए अंग्रेज़ी...
Sunset

कितने प्रस्थान

सूरज अधूरी आत्महत्या में उड़ेल आया दिन-भर का चढ़ना उतरते हुए दृश्य को सूर्यास्त कह देना कितना तर्कसंगत है यह संदेहयुक्त है अस्त होने की परिभाषा में कितना अस्त हो जाना दोबारा...
Naresh Mehta

कवच

मैं जानता हूँ तुम्हारा यह डर जो कि स्वाभाविक ही है, कि अगर तुम घर के बाहर पैर निकालोगे तो कहीं वैराट्य का सामना न हो जाए, तुम्हें...
Vishesh Chandra Naman

मैं

मैं एक तीर था जिसे सबने अपने तरकश में शामिल किया किसी ने चलाया नहींमैं एक फूल था टूटने को बेताब सबने मुझे देखा, मेरे रंगों की तारीफ़ की और मैं...
Gaurav Bharti

कविताएँ: नवम्बर 2021

यात्री भ्रम कितना ख़ूबसूरत हो सकता है? इसका एक ही जवाब है मेरे पास कि तुम्हारे होने के भ्रम ने मुझे ज़िन्दा रखातुम्हारे होने के भ्रम में मैंने शहर...
God, Abstract Human

कौन ईश्वर

नहीं है तुम्हारी देह में यह रुधिर जिसके वर्ण में अब ढल रही है दिवा और अँधेरा सालता हैरोज़ थोड़ी मर रही आबादियों में रोज़ थोड़ी बढ़ रही...
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