Tag: Touch

Venu Gopal

सृष्टि का पहला क्षण

मैंने दीवार को छुआ—वह दीवार ही रही। मौक़ा देखकर हिफ़ाज़त करती या रुकावट बनती। मैंने पेड़ को छुआ—वह पेड़ ही रहा। एक दिन ठूँठ बन जाने की...
Hands, Touch

अवहेलना

सृष्टि की अनछुई देह पर पहला प्रेम स्पर्श 'मौन' का था जो भाषा से असहमत था फिर भी आदम और हव्वा- जिन्हें शाब्दिक स्पर्श की कोई अनुभूति नहीं...
Harshita Panchariya

प्रेम की भाषा

आँखों की अभिव्यक्ति संसार की श्रेष्ठतम अभिव्यक्ति है, आलिंगन संसार की सर्वोत्तम चिकित्सा पद्धति है, स्पर्श से बेहतरीन कोई अनुवाद नहीं, चुम्बन से उच्चतर कोई अनुभूति नहीं। प्रेम की अभिव्यक्ति दो आत्माओं के...
Rahul Boyal

स्पर्श का तरीक़ा

रास्तों को बहुत दूर से नहीं देखना चाहिए संकरे नज़र आते हैं चीज़ों को भी नहीं, छोटी हो जाती हैं आदमी को परखना हो तब तो बहुत पास...
Confident Girl

देह छू ली कि आत्मा

'Deh Chhoo Li Ki Aatma', a poem by Rupam Mishra जाने कैसी-कैसी स्त्रियाँ हैं जिनकी दीठि मुझ पर है! जो औचक आकर मुझे छू लेती हैं मैं गिनगिना...
Shweta Rai

स्पर्श

'Sparsh', poems by Shweta Rai 1 पूस की तिमिर नीरव निशा में, जलते दीये से मिलती ऊष्मा जैसा था तुम्हारा स्पर्श जिसकी गर्माहट आज भी घेरे हुए है मुझे मौसम...

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Gaurav Bharti

कविताएँ: अक्टूबर 2020

किसी रोज़ किसी रोज़ हाँ, किसी रोज़ मैं वापस आऊँगा ज़रूर अपने मौसम के साथ तुम देखना मुझ पर खिले होंगे फूल उगी होंगी हरी पत्तियाँ लदे होंगे फल मैं सीखकर आऊँगा चिड़ियों की...
Asangghosh

‘अब मैं साँस ले रहा हूँ’ से कविताएँ

'अब मैं साँस ले रहा हूँ' से कविताएँ स्वानुभूति मैं लिखता हूँ आपबीती पर कविता जिसे पढ़ते ही तुम तपाक से कह देते हो कि कविता में कल्पनाओं को कवि ने...
Meena Kumari

चाँद तन्हा है, आसमाँ तन्हा

चाँद तन्हा है आसमाँ तन्हा दिल मिला है कहाँ-कहाँ तन्हा बुझ गई आस, छुप गया तारा थरथराता रहा धुआँ तन्हा ज़िन्दगी क्या इसी को कहते हैं जिस्म तन्हा है...
Bolna Hi Hai - Ravish Kumar

प्रेम की कोई जगह

रवीश कुमार की किताब 'बोलना ही है' से हर कोई इश्क़ में नहीं होता है और न हर किसी में इश्क़ करने का साहस होता...
Woman walking on street

माँ के हिस्से की आधी नींद

माँ भोर में उठती है कि माँ के उठने से भोर होती है ये हम कभी नहीं जान पाए बरामदे के घोंसले में बच्चों संग चहचहाती गौरैया माँ को...
Leaf, Autumn, Plant

अक्टूबर

यह अक्टूबर फिर से बीतने को है साल-दर-साल इस महीने के साथ तुम बीत जाती हो एक बार पूरा बीतकर भी फिर वहीं से शुरू हो जाता है...
Dagh Dehalvi

ले चला जान मेरी

ले चला जान मेरी रूठ के जाना तेरा ऐसे आने से तो बेहतर था न आना तेरा अपने दिल को भी बताऊँ न ठिकाना तेरा सब ने...
Woman doing home chores

एक इन्टरव्यू

मैंने बच्चे को नहलाती खाना पकाती कपड़े धोती औरत से पूछा— 'सुना तुमने पैंतीस साल हो गए देश को आज़ाद हुए?' उसने कहा 'अच्छा'... फिर 'पैंतीस साल' दोहराकर आँगन बुहारने लगी दफ़्तर जाती...
Kailash Gautam

कल से डोरे डाल रहा है

कल से डोरे डाल रहा है फागुन बीच सिवान में, रहना मुश्किल हो जाएगा प्यारे बंद मकान में। भीतर से खिड़कियाँ खुलेंगी बौर आम के महकेंगे, आँच पलाशों पर आएगी सुलगेंगे...
Suresh Jinagal

सुरेश जिनागल की कविताएँ: अक्टूबर 2020

ललेश्वरी बर्फ़ का सीना चीरकर उगे चिनार के नीचे बैठकर आग का कोई गीत गाती स्त्री सदियों की बर्फ़ को पिघला रही है उसकी ज़िद, उसका साहस...
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