Tag: इंतज़ार

Morning, Sky, Birds, Sunrise, Sunset

तुम पुकार दो

दिन ढला पक्षी लौट रहे अपने-अपने नीड़ सूर्य का रथ अस्ताचल की ओर, वह नहीं आयी। उसकी प्रतीक्षा में फिर फिर लौटा उसका नाम कण्ठ शून्य में पुकार, निराशा...
Ashok Vajpeyi

प्यार करते हुए सूर्य-स्मरण

यह कविता यहाँ सुनें: https://youtu.be/yUBaa56oly8 जब मेरे होठों पर तुम्हारे होंठों की परछाइयाँ झुक आती हैं और मेरी उँगलियाँ तुम्हारी उँगलियों की धूप में तपने लगती हैं तब सिर्फ़ आँखें हैं जो...
City, Clothes, Home, Street

प्रतीक्षा की समीक्षा

पत्र कई आए पर जिसको आना था वह नहीं आया, व्यंग्य किए चली गई धूप और छाया। सहन में फिर उतरा पीला-सा हाशिया साधों पर पाँव धरे चला गया...
Chandrakant Devtale

घर में अकेली औरत के लिए

तुम्हें भूल जाना होगा समुद्र की मित्रता और जाड़े के दिनों को जिन्हें छल्ले की तरह अँगुली में पहनकर तुमने हवा और आकाश में उछाला था, पंखों में बसन्त...
Rajkamal Chaudhary

अनायास

फिर भी कभी चला जाऊँगा उसी दरवाज़े तक अनायास जैसे, उस अँधियारे गलियारे में कोई अब तक रहता हो। फिर भी, दीवार की कील पर अटका...
Parveen Shakir

इतना मालूम है

अपने बिस्तर पे बहुत देर से मैं नीम-दराज़ सोचती थी कि वो इस वक़्त कहाँ पर होगा मैं यहाँ हूँ मगर उस कूचा-ए-रंग-ओ-बू में रोज़ की तरह...
Virag Vinod

विराग की कविताएँ

प्रतीक्षा हमारे ख़ून में है जिन दिनों हम गर्भ में थे सरकारी अस्पताल की लाइन में लगी रहती माँ और डॉक्टर लंच के लिए उठ जाता, कहते...
Amrita Pritam

तू नहीं आया

चैत ने करवट ली, रंगों के मेले के लिए फूलों ने रेशम बटोरा—तू नहीं आया दोपहरें लम्बी हो गईं, दाखों को लाली छू गई दराँती ने गेहूँ...
Deepak Jaiswal

लूनी नदी

'Looni Nadi', a poem by Deepak Jaiswal अमूमन नदियाँ समंदर में जाकर मिल जाती हैं— पूर्णता को धारण करते हुए एक सुंदर जीवन जीते हुए। लेकिन कुछ नदियों...
Waiting, Train, Girl, Window, Thinking, Alone, Lonely

प्रतीक्षा

'Prateeksha', Hindi Kavita by Rashmi Saxena समुद्र की सभी लहरें शंकाओ से घिरी प्रेमिकाएँ हैं जो आ-आकर तटों पर टहलतीं और लौट जातीं प्रेमी के वापस आने की आस में साँसों की भट्टी...
Old woman

अपूर्ण प्रतीक्षा

“विदेश से आने में लाखों रुपये का खर्च पड़ता है सो मैं ही मना कर देती हूँ। क्या ज़रूरत है फालतू पैसे बर्बाद करने की। मैं सही सलामत हूँ ही और इनकी पेंशन से मेरा काम आराम से चल जाता है, पर बच्चे भी इतने ज़िद्दी ठहरे कि बिना पैसे भेजे मानते ही नहीं।”
Rahul Boyal

प्रतीक्षा और प्रतिफल

'Prateeksha Aur Pratiphal', a poem by Rahul Boyal हम हँसने के तमाम मौक़ों से चूकते गये ये जानते हुए कि हँसना झुर्रियों से लड़ना है। या तो...

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RECENT POSTS

Corona, Covid

उसकी आँखें खुली रहनी चाहिए थीं

(कोरोना से गुज़र गई एक अपरिचित की फ़ेसबुक प्रोफ़ाइल से गुज़रते हुए) 8 मई, 2021 सत्ता है मछली की आँख और दोनों कर्ता-धर्ता अर्जुन और 'ठाकुर' बने थे चूक...
Usha Priyamvada

छुट्टी का दिन

पड़ोस के फ़्लैट में छोटे बच्चे के चीख़-चीख़कर रोने से माया की नींद टूट गई। उसने अलसाई पलकें खोलकर घड़ी देखी, पौने छह बजे...
Sudha Arora

अकेली औरत का हँसना

अकेली औरत ख़ुद से ख़ुद को छिपाती है। होंठों के बीच क़ैद पड़ी हँसी को खींचकर जबरन हँसती है और हँसी बीच रास्ते ही टूट जाती है... अकेली औरत...
Shamsher Bahadur Singh

चुका भी हूँ मैं नहीं

चुका भी हूँ मैं नहीं कहाँ किया मैनें प्रेम अभी। जब करूँगा प्रेम पिघल उठेंगे युगों के भूधर उफन उठेंगे सात सागर। किन्तु मैं हूँ मौन आज कहाँ सजे मैनें साज अभी। सरल से भी...
Franz Kafka, Milena Jesenska

मिलेना को लिखे काफ़्का के पत्रों के कुछ अंश

किताब अंश: 'लेटर्स टू मिलेना' अनुवाद: लाखन सिंह प्रिय मिलेना, काश! ऐसा हो कि दुनिया कल ख़त्म हो जाए। तब मैं अगली ही ट्रेन पकड़, वियना में...
Woman in front of a door

सुबह

कितना सुन्दर है सुबह का काँच के शीशों से झाँकना इसी ललछौंहे अनछुए स्पर्श से जागती रही हूँ मैं बचपन का अभ्यास इतना सध गया है कि आँखें खुल ही जाती...
Rohit Thakur

सोलेस इन मे

कौन आएगा मई में सांत्वना देने कोई नहीं आएगा समय ने मृत्यु का स्वांग रचा है अगर कोई न आए तो बारिश तुम आना आँसुओं की तरह दो-चार बूँदों की...
Fist, Protest, Dissent

एक छोटी-सी लड़ाई

मुझे लड़नी है एक छोटी-सी लड़ाई एक झूठी लड़ाई में मैं इतना थक गया हूँ कि किसी बड़ी लड़ाई के क़ाबिल नहीं रहा। मुझे लड़ना नहीं अब— किसी...
Saadat Hasan Manto

मंटो

मंटो के मुताल्लिक़ अब तक बहुत कुछ लिखा और कहा जा चुका है। उसके हक़ में कम और ‎ख़िलाफ़ ज़्यादा। ये तहरीरें अगर पेश-ए-नज़र...
Sahir Ludhianvi

ख़ून फिर ख़ून है

ज़ुल्म फिर ज़ुल्म है, बढ़ता है तो मिट जाता है ख़ून फिर ख़ून है, टपकेगा तो जम जाएगा ख़ाक-ए-सहरा पे जमे या कफ़-ए-क़ातिल पे जमे फ़र्क़-ए-इंसाफ़ पे...
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