Tag: World

Kunwar Narayan

दुनिया को बड़ा रखने की कोशिश

असलियत यही है कहते हुए जब भी मैंने मरना चाहा ज़िन्दगी ने मुझे रोका है। असलियत यही है कहते हुए जब भी मैंने जीना चाहा ज़िन्दगी ने मुझे निराश...
Girija Kumar Mathur

दो पाटों की दुनिया

चारों तरफ़ शोर है चारों तरफ़ भरा-पूरा है चारों तरफ़ मुर्दनी है भीड़ और कूड़ा है हर सुविधा एक ठप्पेदार अजनबी उगाती है, हर व्यस्तता और अधिक अकेला कर जाती है। हम...
Man, Sleep, Painting, Abstract, Closed Eyes, Face

ईश्वर आख़िर जागता क्यों नहीं?

सूरज चोरी चला गया है, एक जिस्म से ग़ायब है रीढ़ की हड्डी। सत्य, अहिंसा, न्याय, शांति सब किसी परीकथा के पात्र हैं शायद और उम्मीद गूलर के...
Maan bahadur Singh

आदमी का दुःख

राजा की सनक ग्रहों की कुदृष्टि मौसमों के उत्पात बीमारी, बुढ़ापा, मृत्यु, शत्रु, भय प्रिय-बिछोह कम नहीं हैं ये दुःख आदमी पर! ऊपर से जब घर जलते हैं तो आदमी के दिन...
Viren Dangwal

दुश्चक्र में स्रष्टा

कमाल है तुम्हारी कारीगरी का भगवान, क्या-क्या बना दिया, बना दिया क्या से क्या! छिपकली को ही ले लो, कैसे पुरखों की बेटी छत पर उलटा सरपट भागती छलती...
Rag Ranjan

मैं जहाँ कहीं से लौटा

मैंने कभी फूल नहीं तोड़े, जब भी उन्हें छुआ अपनी उंगलियों के पोरों पर एक सतर्क कृतज्ञता महसूस की मैंने किताबों में निशानदेही नहीं की कभी नहीं मोड़ा कोई...
Kaushal Kishore

दुनिया की सबसे सुन्दर कविता

कैसी है वह कितनी सुन्दर? इसे किसी प्रमेय की तरह मुझे नहीं सिद्ध करना है वह देखने में कितनी दुबली-पुतली क्षीण काया पर इसके अन्तर में है विशाल हृदय मैं क्या, सारी...
Natasha

दुनिया और हाथ

1 एक कवि ने कहा- 'दुनिया को हाथ की तरह गर्म और सुन्दर होना चाहिए'* यह बात दुनिया और हाथ दोनों के लिए अच्छी थी फिर एक दिन दुनिया की...
Dream

दो दुनिया

'Do Duniya', a poem by Niki Pushkar मेरी यह यात्रा दो दुनिया की है एक दुनिया, जो मेरे अन्तस की है जहाँ, ख़याली-आवास है मेरा वहाँ तुम्हारी नागरिकता बेशर्त मान्य...
God, Abstract Human

विलियम बी. ड्रीस की कहानी ‘सृष्टि कथा’

दार्शनिक, प्रशिक्षित भौतिकविज्ञानी और धर्मशास्त्री विलियम बी. ड्रीस 2015 से तिलबुर्ग स्कूल ऑफ ह्यूमनिटिज़ में डीन और प्रोफ़ेसर के रूप में सेवाएँ दे रहे हैं।...
Manjula Bist

स्त्री की दुनिया

'Stree Ki Duniya', a poem by Manjula Bist स्त्री की दुनिया बहुत संकीर्ण है उसे सम्भावनाओं में ही जीवन का विस्तार दिखता है। वे युद्ध-काल में गीतों...
Pallavi Vinod

यह समूची दुनिया नास्तिक हो जाए

'Yah Samoochi Duniya Nastik Ho Jae' by Pallavi Vinod "तो तुम्हारे हिसाब से ज़िन्दगी के कुछ निश्चित सूत्र होते हैं, ज़िन्दगी उन्हीं में ढली होती...

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RECENT POSTS

Corona, Covid

उसकी आँखें खुली रहनी चाहिए थीं

(कोरोना से गुज़र गई एक अपरिचित की फ़ेसबुक प्रोफ़ाइल से गुज़रते हुए) 8 मई, 2021 सत्ता है मछली की आँख और दोनों कर्ता-धर्ता अर्जुन और 'ठाकुर' बने थे चूक...
Usha Priyamvada

छुट्टी का दिन

पड़ोस के फ़्लैट में छोटे बच्चे के चीख़-चीख़कर रोने से माया की नींद टूट गई। उसने अलसाई पलकें खोलकर घड़ी देखी, पौने छह बजे...
Sudha Arora

अकेली औरत का हँसना

अकेली औरत ख़ुद से ख़ुद को छिपाती है। होंठों के बीच क़ैद पड़ी हँसी को खींचकर जबरन हँसती है और हँसी बीच रास्ते ही टूट जाती है... अकेली औरत...
Shamsher Bahadur Singh

चुका भी हूँ मैं नहीं

चुका भी हूँ मैं नहीं कहाँ किया मैनें प्रेम अभी। जब करूँगा प्रेम पिघल उठेंगे युगों के भूधर उफन उठेंगे सात सागर। किन्तु मैं हूँ मौन आज कहाँ सजे मैनें साज अभी। सरल से भी...
Franz Kafka, Milena Jesenska

मिलेना को लिखे काफ़्का के पत्रों के कुछ अंश

किताब अंश: 'लेटर्स टू मिलेना' अनुवाद: लाखन सिंह प्रिय मिलेना, काश! ऐसा हो कि दुनिया कल ख़त्म हो जाए। तब मैं अगली ही ट्रेन पकड़, वियना में...
Woman in front of a door

सुबह

कितना सुन्दर है सुबह का काँच के शीशों से झाँकना इसी ललछौंहे अनछुए स्पर्श से जागती रही हूँ मैं बचपन का अभ्यास इतना सध गया है कि आँखें खुल ही जाती...
Rohit Thakur

सोलेस इन मे

कौन आएगा मई में सांत्वना देने कोई नहीं आएगा समय ने मृत्यु का स्वांग रचा है अगर कोई न आए तो बारिश तुम आना आँसुओं की तरह दो-चार बूँदों की...
Fist, Protest, Dissent

एक छोटी-सी लड़ाई

मुझे लड़नी है एक छोटी-सी लड़ाई एक झूठी लड़ाई में मैं इतना थक गया हूँ कि किसी बड़ी लड़ाई के क़ाबिल नहीं रहा। मुझे लड़ना नहीं अब— किसी...
Saadat Hasan Manto

मंटो

मंटो के मुताल्लिक़ अब तक बहुत कुछ लिखा और कहा जा चुका है। उसके हक़ में कम और ‎ख़िलाफ़ ज़्यादा। ये तहरीरें अगर पेश-ए-नज़र...
Sahir Ludhianvi

ख़ून फिर ख़ून है

ज़ुल्म फिर ज़ुल्म है, बढ़ता है तो मिट जाता है ख़ून फिर ख़ून है, टपकेगा तो जम जाएगा ख़ाक-ए-सहरा पे जमे या कफ़-ए-क़ातिल पे जमे फ़र्क़-ए-इंसाफ़ पे...
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