तलाश के बाद मुलाक़ात

‘Talash Ke Baad Mulaqat’, a poem by Vinit Tyagi

सबसे भयावह और डरावना होता है
किसी का बिना पूर्व चेतावनी के चले जाना,
जैसे सूरज का बादलों में छिपकर डूब जाना।
वह अपने पीछे छोड़ जाता है ढेरों सवाल,
जिनके उत्तर सिर्फ़ उसके पास हैं।

की जाती है तस्करी उस हर एक सम्भावना की
जो उसके जाना का कारण बनी।
ऐसा जान पड़ता है जैसे,
सारी तार्किकता और नैतिकता
बस उसी एक की तरफ़ इशारा कर रही हो।
हर मिलने वाली नज़र और हवा की तलाशी ली जाती है
तलाश बन जाती है, दिनचर्या का एक हिस्सा
और ख़ाली समय में तुम शून्य को देखते रहते हो।

समय के साथ बढ़ती जाती है
तुम्हारी तीव्रता और बेचैनी।
उसके ना मिलने पर,
तुम निराश होकर कोशिश छोड़ नहीं सकते।
तब होता है तुम्हें प्रेम की विवशता का आभास,
और ऐसे में यकायक उसके मिल जाने पर
तुम भूल जाओगे जाने का कारण पूछना,
सारे सवाल मिलन में बेमानी जान पड़ेंगे।

ऐसे में सिर्फ़ देखना चाहोगे उनको एक नज़र
और सोचोगे कोई उपाय जिससे वो फिर से ना जाने पाए।