‘The Wanderer: Tears and Laughter’ : : Kahlil Gibran
अंग्रेज़ी से अनुवाद: गौरव अदीब

शाम के वक़्त नील नदी के किनारे एक लकड़बग्घे की मुलाक़ात घड़ियाल से हुई, दोनों रुके और एक दूसरे का इस्तेक़बाल किया।

लकड़बग्घे ने पूछा, “इन दिनों वक़्त कैसा गुज़र रहा है दोस्त?”

घड़ियाल ने जवाब दिया, “बहुत अच्छा तो नहीं दोस्त। दरअसल जब कभी मैं दर्द और दुःख से रो पड़ता हूँ तो लोग हमेशा यही कहते हैं ‘कुछ नहीं बस ये घड़ियाली आँसू हैं’ और इस बात से जो चोट पहुँचती है न, उसे मैं लफ़्ज़ों में बयान नहीं कर सकता।”

यह सुनकर लकड़बग्घा बोला, “तुम अपने दर्द और दुःख की बात करते हो, एक पल को मेरे बारे में सोचो। मैं इस दुनिया की ख़ूबसूरती, इसके चमत्कारों को देखता हूँ और इसके जादू में खोकर हँसने लगता हूँ, ठीक वैसे जैसे दिन खिलखिलाकर हँसता है। और तब इस जंगल के लोग कहते हैं ‘कुछ नहीं, बस ये लकड़बग्घे की हँसी है’।”

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