तेरे जाने से, अब ये शहर वीरान हो गया,
तेरे जादू का असर अब जाने कहाँ खो गया,
तेरी पायल की झंकार से,
ये सारा शहर जाग जाता था,
अब उन झंकारो का खतम नामों-निशान हो गया,
बहुत ढूँढ़ा मैनें तुझे मुसाफिरों की तरह,
भटकता रहा, छिपता रहा, कायरों की तरह,
अब तक तो ये शहर भी पूरा सुनसान हो गया,
ऐसे बिछड़ी या कहूँ खो गयी तू इस शहर से,
तुझे ढूँढने का जारी फरमान हो गया,
तलाशता रहा तुझे शहर के हर इक कोने में,
अब तुझे ढूँढनें का जारी लाखों इनाम हो गया,
तू वजूद थी या परछाईं थी मेरी,
तुझे लिखना बस मेरा आखिरी काम हो गया !!

Previous articleपल-पल काँटा-सा चुभता था
Next articleइक मरुस्थल इक समुंदर
शिवांकित तिवारी 'शिवा'
Young Poet, Writer and Motivational Speaker! Medical Student By Profession!

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here