तेरे ख़तों की ख़ुशबू
हाथों में बस गई है. साँसों में रच रही है
ख़्वाबों की वुसअतों में इक धूम मच रही है
जज़्बात के गुलिस्ताँ महका रही है हर सू
तेरे ख़तों की ख़ुशबू

तेरे ख़तों की मुझ पर क्या-क्या इनायतें हैं
बे-मुद्दआ करम है, बेजा शिकायतें हैं
अपने ही क़हक़हों पर बरसा रही है आँसू
तेरे ख़तों की ख़ुशबू

तेरी ज़बान बनकर अक्सर मुझे सुनाए
बातें बनी-बनायी, जुमले रटे-रटाए
मुझ पर भी कर चुकी है अपनी वफ़ा का जादू
तेरे ख़तों की ख़ुशबू

समझे हैं कुछ उसी ने आदाब चाहतों के
सब के लिए वही हैं अलक़ाब चाहतों के
सब के लिए बराबर फैला रही है बाज़ू
तेरे ख़तों की ख़ुशबू

अपने सिवा किसी को मैं जानता नहीं था
सुनता था लाख बातें और मानता नहीं था
अब ख़ुद निकाल लायी बेगानगी के पहलू
तेरे ख़तों की ख़ुशबू

क्या जाने किस तरफ़ को चुपके से मुड़ चुकी है
गुलशन के पर लगाकर सहरा को उड़ चली है
रोका हज़ार मैंने, आयी मगर न क़ाबू
तेरे ख़तों की ख़ुशबू!

क़तील शिफ़ाई की नज़्म 'लुढ़कता पत्थर'

Book by Qateel Shifai:

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