तेरे लिए मैं जहाँ से टकराऊँगा

‘Tere Liye Main Jahan Se Takraaunga’, a poem by Pallavi Vinod

‘तेरे लिए मैं जहाँ से टकराऊँगा’

एक इस बात को सुनकर जाने
कितनी लड़कियाँ कर लेती हैं मोहब्बत
कॉपी के पन्नों पर भरती हैं उसके नाम के दस्तख़त

और एक दिन निकल पड़ती हैं उसके साथ
सपनों की एक नयी दुनिया बसाने

प्रेम की परीक्षा का सिलेबस बहुत कठिन है
पर कैसे भी सफल तो होना ही है
नए आँगन में चार हैं कमरे
हर कमरे से उसे नाता जोड़ना ही है।

वो मोहब्बत की नज़्म सुनती रही
उल्फ़त के नमूने बुनती रही
दिमाग़ जब भी कहता कि यह प्यार एकतरफ़ा है
दिल रात के चुम्बन की गवाही देने लगता
सोलह बरस की बाली उम्र तीस तक यूँ ही पार होती रही।

जिसे टकराना था दुनिया से
वो अब हर बात पर उसी से टकराने लगा है।

मायके के बुलावे पर लेनी उसकी मंजूरी थी
दुनियादारी की हर रस्म निभानी भी ज़रूरी थी
प्रेम का गुलाब अब सूखने लगा था
लेकिन ख़ुशबू जस की तस उसकी साँसों में बसी हुई थी
सूखे आँसुओं के स्याह निशानों पर वो सूखा गुलाब
अब भी मरहम-सा असर दिखा रहा था
जाने वो इश्क़ की रिवायत थी या ज़िन्दा रहने की मजबूरी थी।

अब तो उसके घुटनों में दर्द रहने लगा है,
कमर भी थोड़ी झुक गई है

पार्क में बैठी मुस्कुराती लड़कियों को देख
वो चाहती है चीख़ना
कि सब झूठ है, फ़रेब है
पर चुप रह जाती है और बन्द आँखों में ख़ुदा से
दुआ माँगती है
इनका इश्क़ बचा लेना!

कल ही उसने अपना गुलाब, गंगा में बहा दिया है।

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