ठगी हुई स्त्रियाँ

‘Thagi Hui Striyaan’, a poem by Harshita Panchariya

प्रेम में ठगी हुई स्त्रियों
की पवित्रता चढ़ा दी जाती है
चरित्रता की सूली पर।

स्पर्श की अनुभूति सीमित
रही तो मात्र देह तक,
बन्द पलकों को माना गया
पर्याय चुम्बनों का।

फिर भी देना नहीं चाहती
चरित्रहीन स्त्रियाँ अपने
निश्छल प्रेम का प्रमाण,
पर पुरुष माँगता आया है
प्रमाण
कभी उभारों से,
तो कभी गहराईयों से।

जिसे जितना उतारा
उसने उतना ही ठगा,
कभी स्वप्न में तो,
कभी स्मृतियों में।

प्रेम की ऐसी लालसाएँ
जो दृश्यमान होते हुए भी
अदृश्य थीं, ने ठगा
उन समूची स्त्रियों को
जिन्होंने नहीं माँगा कभी
चुटकी भर सिंदूर भी।

स्त्रियों! ठगने से पूर्व
समझ लेना,
कायरता नपुंसकता
की निशानी है
और ठगी हुई स्त्रियाँ
पराकाष्ठा है समर्पण की।

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