मैं ठहर जाऊँगा किसी दिन,
वैसे ही जैसे ओस
घास पे ठहर जाती है,
भले ही थोड़ी देर बाद
भाप बन जाऊँ,
भाप में ठहरा रहूँगा कुछ देर, हवा के साथ
उड़ती हुई हवा के साथ
ठहरा हुआ उड़ूँगा,
बूँद बनकर बादल में ठहरूँगा फिर
बारिश बनकर गिरूँगा उसमें ठहरा हुआ,

पोखरों में ठहरा रहूँगा कुछ दिन,
कोई प्यासी चिड़िया थोड़ा ठहरकर
मुझे पी लेगी!

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मुदित श्रीवास्तव
मुदित श्रीवास्तव भोपाल में रहते हैं। उन्होंने सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है और कॉलेज में सहायक प्राध्यापक भी रहे हैं। साहित्य से लगाव के कारण बाल पत्रिका ‘इकतारा’ से जुड़े हैं और अभी द्विमासी पत्रिका ‘साइकिल’ के लिये कहानियाँ भी लिखते हैं। इसके अलावा मुदित को फोटोग्राफी और रंगमंच में रुचि है।

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