1

मैं उस प्रेम को वापस जीना चाहता हूँ
जब प्रेम हमारे लिए नया था,

जब कुछ दूर साथ चलने में
कुछ दूरी का फ़ासला बरतते हम दोनों,
लोक-लाज के भय से
अपने बीच व्याप्त अंतरिक्ष को
पाट पाने में नाकाम,
अपना भविष्य
एक-दूसरे की बाँहें थामे चल रही
अपनी परछाईयों में
तलाश रहे थे।

2

पूनम की यह रात भी आ गई,
रात के माथे पर
चाँद बिंदी-सा टंग गया,
वादे के मुताबिक़ आज मिलना था हमें

मगर, तुम नहीं आयीं…

रात ने आसमान पर झूमर सजा दिए,
चाँद के आदेश पर
सितारों ने टिमटिमाहट बढ़ा दी,
एक तारा मेरी ख़ातिर टूट पड़ा,
मैंने तुम्हारा आना माँगा

मगर, तुम नहीं आयीं…

संसार में बिखरे तमाम शब्दों में से
मैंने एक शब्द ‘प्रेम’ चुना था,
जीवन जीने के ख़्याल के लिए निहायत ज़रूरी शब्द।
जब भी ‘प्रेम’ लिखना होता है मुझे
मेरी वर्णमालाओं की अज्ञानता ज़ाहिर हो जाती है,
मैं तुम्हारा नाम लिख देता हूँ, यह बताना था तुम्हें

मगर, तुम नहीं आयीं।

3

तुम्हारी कविताएँ पढ़ना,
ऐसा होता है जैसे मैं एक किताब पढ़ रहा हूँ,
जिसकी ख़ुशबू काफ़ी है
मुझे अपने पास घण्टों बिठाए रखने के लिए,
लेकिन मैं इसे धीरे-धीरे पढ़ रहा हूँ।

धीरे पढ़ने का बड़ा कारण है,
इसके ख़त्म हो जाने का डर।

अब लगने लगा है,
शब्द वास्तव में बहुत दूर हैं
और शब्दों के बीच
अनंत प्रकाश वर्ष जितना अंतरिक्ष व्याप्त है।

तुम्हारी कविताओं में
मैं महसूस कर सकता हूँ तुम्हें
और हमारी कहानी को,
जिसे तुमने शब्दों के मायाजाल में बुनकर
दुनिया को भ्रमित किया है
ताकि हमारे प्रेम को
किसी की नज़र न लग जाये।

लेकिन आजकल तुम्हारे शब्द मुझे भी उलझा देते हैं,
उन शब्दों के बीच इस अंतहीन स्थान में
अब मैं ख़ुद को ढूँढ रहा हूँ।

शायद इसकी वजह
तुम्हारी पिछली कुछ कविताएँ हैं
जिनमें एकांत का एकालाप है,

जबकि तुम मेरी बाँहों में
अपने एकांत के गीतों को
दोहरा रही हो, बारम्बार।

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विक्रांत मिश्र
उत्तर प्रदेश के गोरखपुर से हैं। साहित्य व सिनेमा में गहरी रुचि रखते हैं। किताबें पढ़ना सबसे पसंदीदा कार्य है, सब तरह की किताबें। फिलहाल दिल्ली में रहते हैं, कुछ बड़ा करने की जुगत में दिन काट रहे हैं।